ऋग्वेद
भक्तिभाव से निकले
उद्गार जो छन्दोमय
मन्त्रों(ऋचाओं) के रूप
में हैं I ऋक
(ऋचा) के ज्ञान
को ही ऋग्वेद
कहते हैं I इनमें प्रथम (आध्यात्मिक)
वृत्ति की उपज
तथा धार्मिक एवं
लौकिक विचार व
दार्शनिक भावनाएं हैं I भारत
की प्राचीनतम संस्कृति
का विकास इसमें
पाया जाता है
I
लोकमान्य बाल गंगाधर
तिलक की
गणना के अनुसार
ऋग्वेद के ऐतरेय
ब्राह्मण एवं यजुर्वेद
के शतपथ ब्राह्मण
की रचना ४,५०० वर्ष
पूर्व हुई I इसे
प्रमाणित करने के
लिए उन्होंने यह
ढूँढा कि उस काल के
विषुव(equinoxes) किन दिनों,
किस विशिष्ट नक्षत्र में घटित होते थे
I उन्होंने पाया कि वे दिन और विशिष्ट नक्षत्र आज के दिनों से भिन्न थे
I इसमें ४,५००
वर्ष पहले परिवर्तन हुआ
था, और आज भी वही
स्थिति है I परिवर्तन का यह समय, ऋग्वेद के ऐतरेय
ब्राह्मण एवं यजुर्वेद
के शतपथ ब्राह्मण
की रचना का
काल था I ऋग्वेद
के मन्त्रों की
रचना इससे भी
पहले हो चुकी
थी I सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (३०० ई.पू.)
तक अनेक राजवंश लगभग ६,५०० वर्षों तक भारतवर्ष में राज्य कर चुके थे, और इनसे बहुत
पहले ही ऋग्वेद की रचना हो चुकी थी I तो,ऋग्वेद के मन्त्रों का निर्माण काल लगभग ८,००० वर्ष पूर्व माना जा सकता
है I
ऋग्वेद के १०
वें मण्डल में
सूक्त ३९ / मन्त्र
६ और सूक्त
४७ / मन्त्र २
में चार समुद्रों
का उल्लेख है
I बाद में इसी
मण्डल के सूक्त
१३६ / मन्त्र ५
में दो समुद्रों
(पूर्वी और पश्चिमी)
का उल्लेख है
I पहले वाले सूक्तों
के उत्तरी और
दक्षिणी समुद्रों में से,
उत्तरी समुद्र के अवशेष मिलते हैं
– Black Sea, Caspian Sea, Aral Sea,
Balqash Lake के रूप में
I दक्षिणी समुद्र
अरावली पर्वत श्रृंखला के
दक्षिण में हुआ
करता था, और उस के अवशेष राजस्थान
की सांभर झील
के रूप में
हैं I इन समुद्रों
का अस्तित्व ५०
हज़ार से ७५
हज़ार वर्ष पूर्व
था I इस से
यह अनुमान निकाला
गया है कि
सम्भवतः ऋग्वेद इसी अति प्राचीन
काल में संकलित
किया गया हो I
यह सम्भव हो
सकता है कि
ऋग्वेद का वर्तमान
स्वरुप मानव जाति
के सम्मुख ८ ,०००
वर्ष पूर्व ही
परिरक्षित रूप में
आ पाया हो I
ऋग्वेद-संहिता
:
ऋग्वेद की मन्त्र
संहिता का
दो प्रकार की प्रणालियों
से वर्गीकरण किया
गया है :
(१) अष्टक प्रणाली : यह
प्राचीन है - ८
अष्टक / ६४ अध्याय
/ २००८
वर्ग / ऋचाएं (छन्दयुक्त मन्त्र) I
(२) मण्डल प्रणाली : यह अपेक्षाकृत
आधुनिक है, और
सुसंगठित प्रतीत होती है
- १० मण्डल / ८५
अनुवाक / १०२८ (१०१७ + ११ बालखिल्य) सूक्त(एक
आशय वाले मन्त्रों का संग्रह) / १०,५८०ऋचाएं (छन्दयुक्त मन्त्र) I
प्रत्येक सूक्त के
विशिष्ट देवता,ऋषि और छन्द
हैं I
२
मण्डल यह दर्शाता
है कि वह
किस ऋषि-वंश
/ गोत्र से सम्बन्धित
है I
मण्डल
|
ऋषि / उनके कुल
से सम्बन्ध
|
|
१ (बड़ा)
|
बहुत से ऋषि
(२३)
|
|
२
|
गृत्समद
|
|
३
|
विश्वामित्र
|
|
४
|
वामदेव
|
|
५
|
अत्रि
|
|
६
|
भारद्धाज
|
|
७(प्राचीनतम
)
|
वशिष्ठ
|
|
८
|
कण्व / अंगिरस
|
|
९
|
बहुत से ऋषि
|
|
१०(बड़ा
)
|
बहुत से ऋषि
(भाषा कुछ सरल , क्योंकि
नयी है )
|
ऋचाओं को पढ़नेवाला
होता
कहलाता है, जो
उच्च स्वर से
अग्नि में आहुति
देता है I ये
प्रार्थनाएं हैं जो
मुख्यतः लौकिक और देवताओं
के विषयवस्तु हैं
I
लौकिक विषय हैं
: द्यूतक्रीड़ा के दोष,
मण्डूकों की ध्वनि,
विवाह की विधि,
दान की महिमा
I
देवता, जिनकी प्रार्थना
की गयी है
: प्रमुख हैं अग्नि,
इन्द्र I अन्य देवता
हैं : सविता, रूद्र,
मित्र, वरुण, सूर्य, मरुत,
उषा, मन्यु (क्रोध)
आदि I
ऋग्वेद की २१
शाखाएं
थीं (पतंजलि महाभाष्य
तथा मुक्तिकोपनिषद् के
अनुसार) I अब केवल
दो शाखाएं मिलती
हैं - शाकल तथा बाष्कलीय I शाखा का
तात्पर्य है : विशिष्ट
ऋषियों द्वारा
स्थापित वेदपाठ की अलग-अलग परम्पराएं
I
ऋग्वेद के कुछ महत्वपूर्ण सूक्त (एक आशय वाले मन्त्रों का समूह) १० वें
मंडल में हैं
I ये हैं :
हिरण्यगर्भ सूक्त : संसार के
आरम्भ में हिरण्यगर्भ(परमात्मा) (Golden Egg) ही
था जो चराचर
का स्वामी था,
और उसी ने
स्वर्ग, पृथ्वी सभी को
धारण किया I उत्पन्न
होने पर वह
सारे प्राणियों का
अद्वितीय अधीश्वर था I विशाल
पर्वत और गम्भीर
सागर उस हिरण्यगर्भ
रूप परमात्मा (प्रजापति)
के अनुशीलन में
ही अवस्थित है
I उसने इस पृथ्वी
और आकाश को
अपने-अपने स्थानों
में स्थापित किया
I उस प्रजापति की
हम हवि द्वारा
पूजा करें अथवा
हम किस देवता
की हवि द्वारा
पूजा करें I
पुरुषसूक्त : सृष्टि की प्रक्रिया
का प्रतिपादन I जो
कुछ हुआ है,और जो
होनेवाला है, वह
पुरुष (ईश्वर) ही है
- वह प्राणियों के
निमित्त अपनी कारणावस्था
को छोड़ कर
जगदावस्था को प्राप्त
करता है I उसके
तीन अविनाशी अंश
३
दिव्यलोक में हैं
तथा उसका एक
अंश ही यह
ब्रह्माण्ड है I उस
आदिपुरुष से जीव-पुरुष उत्पन्न हुए,
जो देव, मनुष्य
आदि रूप हुए,
तथा अन्य जीव
भी हुए I पुरुष
से ऋक, यजु,
साम उत्पन्न हुए
I
नासदीय सूक्त : सृष्टि की
रहस्यमयता का संकेत
: सृष्टि के पहले
अन्धकार से घिरा
हुआ अन्धकार ही
उस समय वर्तमान था I उस
प्रलय की अवस्था
में असत, सत
नहीं था, पृथ्वी,
आकाश नहीं था
, ब्रह्माण्ड भी कहाँ
था I किसका कहाँ
स्थान था ? क्या
जल उस समय
था ? उस समय
मृत्यु, अमरता नहीं थी,
रात-दिन का
भेद भी नहीं
था I वायु -शून्य,
स्वावलम्बी श्वास-प्रश्वास युक्त
केवल एक ब्रह्म
था I उसके अतिरिक्त
कुछ नहीं था
I सर्वप्रथम परमात्मा में सृष्टि
की इच्छा उत्पन्न
हुई I उससे बीज
की उत्पत्ति हुई
I बीज-धारक पुरुष
उत्पन्न हुआ I ऊपर पुरुष
(भोक्ता ) और नीचे
स्वधा(अन्न) अवस्थित
हुआ I ये नाना
सृष्टियाँ कहाँ से
हुईं, किसने कीं,
किसने नहीं कीं
- यह सब वे
ही जानें जो
इनके स्वामी हैं
I हो सकता है,
वे भी यह
सब नहीं जानते
हों I
संवाद सूक्त (उर्वशी-पुरूरवा
संवाद,यम-यमी
संवाद) सामान्य जीवन को
व्यक्त करते हैं
I प्रेम, हास्य, करुणा,वीरता,
जैसे मानवीय भाव
I वैसे ही गो-सूक्त,भाषा-सूक्त,
नदी सूक्त ,गर्भरक्षक
सूक्त ,संज्ञान(एकता) सूक्त
भी जीवन के
विविध पहलुओं पर
प्रकाश डालते हैं I
ऋग्वेद में आर्यों
तथा दासों के
जीवन की जानकारी
मिलती है I आर्य
: दानी,उदार,धर्मनिष्ठ Iदास : कृपण,अनुदार,नास्तिक I
ऋग्वेद
के ब्राह्मण-ग्रन्थ :
ऐतरेय ब्राह्मण : विषय हैं
सोमयाग,अग्निहोत्र,राजसूय,राज्याभिषेक
I इसमें सोम की
आहुतियां, अग्निहोत्र गद्यरूप में
दिए गए हैं
I रचयिता हैं
ऐतरेय महीदास I
कौषीतकि (शांखायन) ब्राह्मण
: विषय हैं सोमयाग,
अग्निहोत्र, राजसूय, राज्याभिषेक I इसमें
सोम की आहुतियां,
राज्याभिषेक से सम्बंधित
अनुष्ठान गद्यरूप में दिए
गए हैं I रचयिता
हैं कहोड़ कौषीतकि I
ऋग्वेद
के आरण्यक :
ऐतरेय आरण्यक - ऐतरेय
ब्राह्मण ग्रन्थों से सम्बद्ध,
और उन्हीं के
अंग I
कौषीतकि(शांखायन) आरण्यक
: कौषीतकि ब्राह्मण ग्रन्थों से
सम्बद्ध, और उन्हीं के
अंग I
ऋग्वेद
के उपनिषद् :
ऐतरेयोपनिषद
कौषीतकि उपनिषद् + इससे
सम्बद्ध ८ छोटे
उपनिषद् I
४
यजुर्वेद
यज्ञकर्म रुपी प्रणाली,
आहुति कर्म, व अनुष्ठान-
विषयक I
यजुर्वेद - संहिता
:
यज्ञों से सम्बन्धित
मन्त्रों के ४०
अध्याय / १,८८६
श्लोक ( इनमें से आधे
ऋग्वेद से उद्धृत
हैं ) I
यजुर्वेद की १०१
शाखाएं हैं
(पातंजलि महाभाष्य के अनुसार
१००, मुक्तिकोपनिषद् के
अनुसार १०९ ) I
यज्ञ में
यजुओं को पढ़नेवाला
तथा कर्मविधि करानेवाला
अर्ध्वयु(conductor of sacrifices) कहलाता है I
यजुर्वेद में दो
सम्प्रदाय हैं : कृष्ण यजुर्वेद
और शुक्ल यजुर्वेद
I
कृष्ण
यजुर्वेद में
संहिता व ब्राह्मण
का सम्मिश्रण है
I सम्मिश्रण के इस
गुण के कारण
इसका नाम "कृष्ण
यजुर्वेद " पड़
गया और इस
प्रकार यह शुक्ल
(शुभ्र या शुद्ध
) से पृथकत्व रखता
है I इस
में मुख्यतः यज्ञों
के विधान हैं
I मन्त्रों के अतिरिक्त
ब्राह्मण ग्रन्थ के विषय
हैं तथा चर्चाएं
हैं I
कृष्ण
यजुर्वेद की ४
शाखाएं हैं, जिनके
अंतर्गत संहिताएं (संग्रह ) हैं
:
१. तैत्तिरीय
संहिता : यह सर्वाधिक प्रसिद्ध
शाखा है I इसमें
७ काण्ड / ४४
प्रपाठक / ६३१ अनुवाक
हैं I विषय हैं - यज्ञीय कर्मकाण्ड
, वाजपेय , राजसूय , पौरोडाश , याजमान
आदि I
२ ,३
, और ४ मध्य
व दक्षिण
भारत में प्रचलित
हैं I
२ . मैत्रायणी
संहिता : इसमें दशपूर्णमास , चातुर्मास्य
, राजसूय , सौत्रामणि आदि हैं I
३ . कठ
(काठक) संहिता : इसमें इसमें
५ खण्ड / ४०
स्थानक / १३
अनुवाचन / ८४३ अनुवाक
/ ३०९१ मन्त्र हैं I दशपौर्णमास
, अग्निहोत्र , आधान , अश्वमेध , पशुबन्ध
आदि हैं I
४ . कपिष्ठल
संहिता : यह
अपूर्ण मिली है
I इसमें
६ अष्टक / ४८
अध्याय हैं I इसमें
कठ के ही समान
विषय हैं I
शुक्ल
यजुर्वेद
में शुद्ध रूप
से केवल मन्त्र
हैं I इसे वाजसनेय
(याज्ञवल्क्य ) संहिता भी कहते
हैं I संहिता से ब्राह्मण
ग्रन्थ पृथक है I
इसमें दशपौर्णमास ,अग्न्याधान
, वसोर्धारा , सौत्रामणी , अश्वमेध, पितृमेध
, महावीर सम्भरण आदि हैं
I इसकी
दो शाखाएं हैं
:
१ . माध्यन्दिनी संहिता
: इसमें ४० अध्याय
/ १९७५ कण्डिका / ३९८८ मन्त्र
हैं I
माध्यन्दिन संहिता के
दो भाग हैं
- पूर्वविंशति एवं उत्तरविंशति
I
५
पूर्वविंशति में १
से २० अध्याय
(१२११ कण्डिका / २५८५
मन्त्र ) हैं I
उत्तरविंशति में २१
से ४० अध्याय
(७६४ कण्डिका / १४०३
मन्त्र ) हैं
I
अध्याय १४ वेदिकाओं
के लिए इष्टका(
ईंट) स्थापन I
अध्याय १६ : रुद्राध्याय
(रूद्र के विभिन्न
रूपों को नमस्कार
) I
अध्याय २२
अश्वमेध की विशेष
आहुतियां I
अध्याय २४ अश्वमेध में देवताओं
के लिए पशु-पक्षियों का स्थापन I
अध्याय २५
अश्वमेध में वनस्पतियों
की विशेष आहुतियां
I
अध्याय २८
प्रकृति का विराट
यज्ञ I
अध्याय ३४ : शिवसंकल्प
प्रार्थना I
अध्याय ३५ : पितरों
की प्रार्थना I
अध्याय ३७
यज्ञ में मृत्तिका
, अग्नि आदि की
स्थापना I
अध्याय ३८
गौ , रस्सी आदि
से सम्बन्धित I
अध्याय ४० : विशुद्ध ज्ञानकाण्डपरक,
दार्शनिक अध्याय है : ईश्वर संसार
का नियामक है
- यज्ञकर्म से शुद्ध
हुए अंतःकरण को
आत्मज्ञान से संस्कारित
करने हेतु I ईशावस्योपनिषद् इसी
से निकला है
I पहले के ३९ अध्याय
कर्मकाण्डपरक हैं I
पद्यात्मक मन्त्र : कर्मकाण्ड
से सम्बंधित I
गद्यात्मक मन्त्र : राष्ट्रीय
भावना से ओतप्रोत
I
२ . काण्व
संहिता : ४० अध्याय
/ ३२८३ अनुवाक / २०८६ मन्त्र
I विषयवस्तु माध्यन्दिनी संहिता के ही
समान है I
यजुर्वेद में अनुष्ठान
विषयक संहिताओं के
अतिरिक्त ऐसी प्रार्थनाएं
भी हैं, जिनमें
वेदिका, ईंटें, सहारा(stakes)
के निर्माण का
उल्लेख है I
यजुर्वेद
के ब्राह्मण :
पूर्ववर्ग :
६
कृष्ण यजुर्वेद : अलग
से कोई ब्राह्मण
नहीं है I तैत्तिरीय ब्राह्मण (तैत्तिरीय
संहिता का परिशिष्ट
) I इसमें ३ काण्ड
(अष्टक ) / ३ अध्याय हैं
I विषयवस्तु
है अग्न्याधान यज्ञ,
गवामयन यज्ञ, सौत्रामणि यज्ञ आदि
I ये
गद्य रूप में
हैं I
उत्तरवर्ग :
शुक्लयजुर्वेद : याज्ञवल्क्य ऋषि ने
इसे सूर्योपासना से
पाया , अतः पूरे
ब्राह्मण ग्रन्थ में यह
प्रामाणिक है I
माध्यन्दिनी शाखा : शतपथ
ब्राह्मण I इसमें १४ काण्ड
/ १०० अध्याय हैं
I
काण्व शाखा : शतपथ
ब्राह्मण I इसमें १७ काण्ड / १०४ अध्याय हैं I
इन दोनों
की ही
विषयवस्तु में हैं दशपूर्णमास
, पितृयज्ञ (श्राद्ध ), उपनयन , स्वाध्याय,
अश्वमेध ,सर्वमेध आदि I
अग्निचयन अध्याय में
शाण्डिल्य ऋषि को
प्रामाणिक माना गया
है I बृहदारण्यक उपनिषद्
इसी ब्राह्मण का
अन्तिम भाग है
I
यजुर्वेद
के आरण्यक
बृहदारण्यक
तैत्तिरीय आरण्यक
मैत्रायणी आरण्यक
यजुर्वेद
के उपनिषद्
(i) कृष्ण यजुर्वेद
: कठोपनिषद (यम
- नचिकेता संवाद में आत्मा
का स्वरुप )
श्वेताश्वतर उपनिषद
मैत्रायणी (मैत्री) उपनिषद्
तैत्तिरीय उपनिषद्
(ii) शुक्ल यजुर्वेद : ईशोपनिषद
(छोटा : केवल १७
मन्त्र -यजुर्वेद
का ४० वां
व अंतिम अध्याय
)
बृहदारण्यक उपनिषद् (बड़ा : जनक
-याज्ञवल्क्य शास्त्रार्थ से ब्रह्म
का निरूपण -
याज्ञवल्क्य की विदुषी
पत्नी मैत्रेयी तथा उनसे
शास्त्रार्थ करनेवाली गार्गी की
कथा )
+
३१ छोटे उपनिषद्
७
सामवेद
देवताओं का आवाहन,
सोम की आहुति
के लिए उद्गाता (सामों को गानेवाला)
द्वारा स्वरसहित पाठ I साम
का अर्थ है
ऋचाओं का आलाप I
अधिकतर ऋचाएं
ऋग्वेद से ली
गयी हैं I
भारतीय संगीतशास्त्र की
उत्पत्ति तथा विकास
सामवेद से ही
हुआ है I साम
के स्वर मण्डल
में आते हैं : ७ स्वर,
३ ग्राम, ३१
मूर्छना, ४९ तान
I सात स्वरों को
२२ श्रुतियों में
विभाजित किया गया
है I ये श्रुतियां
कान के द्वारा
अनुभव की
जाने वाली विशिष्ट
तरंगें हैं, जो
मनुष्यों, प्राणियों तथा
वस्तुओं पर
विशेष प्रकार के
प्रभाव डालती हैं I ये
प्रभाव भौतिक और मानसिक,
दोनों ही प्रकार
से पड़ते हैं
I सामवेद के मन्त्र
इसी तथ्य पर
आधारित हैं, जिनसे
कष्टों का निवारण
किया जाता था I
साम को ठीक स्वर में गाने वाले अब बहुत कठिनाई
से मिलते हैं I यदि इनका उचित प्रकार से उपयोग किया जाए, तो दिव्य अनुभूति होती है
I यह इस बात से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आज भी अच्छे संगीतकारों के गायन / वादन
से श्रोताओं पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है I
सामवेद की १०००
शाखाएं हुआ करती
थीं अब
केवल ४ शाखाएं
उबलब्ध हैं :
१ , कौथुमी (सर्वाधिक
लोकप्रिय )
२ . जैमिनीय
३ . राणायनीय
4. ताण्ड्य
सामवेद
- संहिता :
सामवेद में ४० पुस्तकें
/ ३२ अध्याय / गानरूप
में ४६० प्रार्थनाएं(hymns) हैं I
७५ मन्त्रों
को छोड़कर, शेष
मन्त्र ऋग्वेद की ऋचाओं
से लिए गए
हैं I
सामवेद के दो मुख्य विभाग हैं - १ आर्चिक तथा
२ गान I
आर्चिक ऋग्वेद के मन्त्रों का समूह है, जिसके
दो विभाग हैं - पूर्वार्चिक तथा उत्तरार्चिक I
पूर्वार्चिक में ग्रामगेय गान (प्रकृति / वेयगान)
तथा अरण्य गान है I यह ६ प्रपाठक (अध्याय) / ६५० मन्त्रों से निर्मित है, जिसके ४ पर्व
(काण्ड) हैं - आग्नेय पर्व (अध्याय १), ऐन्द्र पर्व (अध्याय २-४), पावमान पर्व (अध्याय
५ ), तथा आरण्य पर्व (अध्याय ६) I पहले तीन ग्रामगान कहलाते हैं क्योंकि ये
८
ग्रामों में गाये जाते थे, तथा आरण्य पर्व केवल
अरण्य (वन) में ही गाये जा सकते थे, ग्रामों में नहीं - क्योंकि इनमें संकटपूर्ण और
वर्जित राग हैं I
उत्तरार्चिक में ९ प्रपाठक (अध्याय) / १२२५ मन्त्र
हैं, जिनमें दशरात्र, संवत्सर, तथा एकाह पर्व हैं I इस में ऊहगान तथा ऊह्यगान (रहस्य
गान) हैं I ये यज्ञकार्य में साममन्त्रों को क्रमबद्धता प्रदान करते हैं I
ग्रामगेय, अरण्य, ऊह तथा ऊह्यगान को संगीतबद्ध
किया गया I परन्तु इनके लिखने का ढंग (notation) जब समझ के बाहर हो गया, तब इन्हें
अर्चिका के रूप में सम्बद्ध किया गया I
इस पर सायण ने भाष्य लिखा है I मन्त्रों के ऊपर लिखी संख्याएं उस मन्त्र - समूह के
स्वरों को इंगित करती है I
सामवेद
के ब्राह्मण
:
- ताण्ड्य (पंचविश/प्रौढ़ ) ब्राह्मण : २५ पुस्तकें - प्राचीन दन्तकथाओं के साथ व्रात्यों (आर्यजाति से बहिष्कृत वर्ग ) के पुनः वर्णप्रवेश का वर्णन I
- षड्विंशति ब्राह्मण : १ पुस्तक - चमत्कार एवं शकुन से सम्बद्ध "अद्भुत ब्राह्मण " नामक एक अध्याय है I
- सामविधान ब्राह्मण
- आर्षेय छान्दोग्य ब्राह्मण
- देवताध्याय ब्राह्मण
- मन्त्र ब्राह्मण (संहितोपनिषद )
- जैमिनीय (तलवकार ) ब्राह्मण : ३ भागों में - शतपथ ब्राह्मण (यजुर्वेद ) के सामान महत्वपूर्ण I विज्ञान की भी सामग्री मिलती है I
सामवेद के सूत्र
ग्रन्थ "प्रातिशाख्य" के नाम
से जाने जाते
हैंI
सामवेद
के आरण्यक
:
तलवकार आरण्यक (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण)
सामवेद
के उपनिषद :
छान्दोग्य उपनिषद्
केनोपनिषद : यह
बड़ा है
+ १४ छोटे
उपनिषद्
९
अथर्ववेद
यज्ञ से
भिन्न विषयों का
आध्यात्मिक तथा अमंगल
- बाधक संकलन I वैदिक परम्परा
में यह "ब्रह्मवेद
" कहलाता हैI
अथर्ववेद के रचयिता
हैं अथर्वा तथा
अंगिरा I अथर्वा
के शिष्य भृगु
को अथर्ववेद के
प्रचार - प्रसार का श्रेय
जाता है I
अथर्वा, वेदों के
शान्तिपरक मन्त्रों के दृष्टा
हैं तथा इन्होंने
जनकल्याण हेतु इन्द्रजाल
मन्त्रों की रचना की
I अंगिरा ने हानिपरक
मन्त्रों की रचना
की I
ब्रह्मा नामक ऋत्विक
के उपयोग के
लिए, जो होता,
अर्ध्वायु , एवं उद्गाता
की त्रुटियों का
संशोधन करता था
I यन्त्र - मन्त्रों द्वारा विघ्न
- विनाश करनेवाला I
पतंजलि महाभाष्य के
अनुसार अथर्ववेद की ९
शाखाएं हैं (मुक्तिकोपनिषद्
के अनुसार ५०
शाखाएं) I
अब केवल
२ शाखाएं उपलब्ध
हैं : १ शौनक
और २ पैप्पलाद
I
अथर्ववेद
संहिता : २० काण्ड
/ ७३१ सूक्त (एक
सूक्त में एक
ही विषय ) / ५८४९ मन्त्र
(१२०० मन्त्र ऋग्वेद
से )I
प्रथम काण्ड
: ४ मन्त्रों वाला
I
द्वितीय काण्ड : ५
मन्त्रों वाले I
तृतीय काण्ड : ६
मन्त्रों वाले I
चतुर्थ काण्ड :७
मन्त्रों वाले I
पंचम काण्ड
: न्यूनतम ८ मन्त्रों
वाले I
षष्ठम काण्ड : ३
मन्त्रों वाले (१४२ सूत्र
) I
सप्तम काण्ड : १
-२ मन्त्रों
वाले (११८ सूत्र ) I
१५ -१६
काण्ड : गद्य में
I ब्राह्मण
ग्रंथों के समान शैली
अथर्ववेद में हमें
आर्य मध्यम वर्ग(Aryan middle class) तथा वणिक,कृषक, स्त्री
के दैनिक जीवन
का आभास मिलता
है I तत्कालीन लौकिक
विषय हैं :
- अभिचार (मारन, मोहन,
उच्चाटन आदि ) सम्बद्ध क्रियाएँ
- शत्रुनाश
- आरोग्यप्राप्ति
१०
- गृहसुख
- कृषि में
वृद्धि
- भूत -प्रेत
निवारण
- कीट - पतंगों का
नाश
- इष्ट वस्तु
का लाभ
- विवाह
- वाणिज्य
- पितृ पूजा
- विविध रोग स्वरुप
तथा उनका निवारण
(सर्पविष नाश प्रार्थना
, शमीवृक्ष प्रार्थना , जीविका मन्त्र
प्राप्ति )
- पहेलियाँ
- ब्रह्मचर्य की महत्ता
- सौमनस्य
अथर्ववेद में दार्शनिक
सूक्त भी हैं
(ब्रह्मन, तपस, असत
विषयक विचार ) I ये बाद
में उपनिषदों
में विकसित हुए
I
अथर्ववेद ब्राह्मण-ग्रन्थ :
पहले अथर्ववेद
में कोई ब्राहमण
नहीं था I बाद
में विभिन्न ब्राहमण
ग्रंथों से सामग्री
लेकर गोपथ ब्राहमण
का निर्माण हुआ
I गोपथ ब्राहमण में २
पुस्तकें हैं - पूर्व गोपथ
एवं उत्तर गोपथ
I इनमें
सृष्टि , ब्रह्मा , ब्रह्मचर्य , गायत्री
आदि की महिमा
का वर्णन है
I ओंकार के साथ
त्रिमूर्ति का भी
उल्लेख है I
अथर्ववेद
आरण्यक :
अथर्ववेद में आरण्यक
नहीं मिलते हैं
I
अथर्ववेद
उपनिषद् :
प्रश्नोपनिषद ,मुण्डकोपनिषद तथा माण्डूक्य
उपनिषद् (यह छोटा है - केवल 12
वाक्य) I
अथर्ववेद के रोग नाशक मंत्र मानव के कल्याणकारियों उपयोगी एवं सार्थक मंत्र है "
ReplyDelete