Thursday, 2 April 2015

सनातन धर्म सोपान -३ : वेदों का सिंहावलोकन


वेद

वेद शब्द संस्कृत धातु शब्द 'विद्' से निकला है, जिसका भावार्थ है 'विद्या’, ‘ज्ञान' I इसका निकटतम अंग्रेजी भावार्थ हैvision अथवा philosophy I 

'श्रुति' (वह जो सुना गया है) से वेद निकले हैं I वेदों में सारी विद्या, सारा ज्ञान समाहित है I और वेदों के अन्दर ही आर्यों के मूल धर्म (सनातन धर्म) का स्वरुप छिपा हुआ है I कालान्तर में धर्म की विभिन्न शाखाएं उत्पन्न हो गयीं, परन्तु सनातन धर्म का वास्तविक स्वरुप वेदों में ही है I

वेदों को ब्रह्मा ने प्रकट किया I उन्हें ऋषियों ने तप के द्वारा सुना, देखा, और शब्दों का रूप दिया, जिससे आर्य जाति लाभान्वित हो सके :

युगान्ते अन्तर्हितान वेदान् सेतिहासान् महर्षयः I

लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता स्वयम्भुवा II       - देवी भागवत (::२९)

"वेदों तथा इतिहासों को युगों के अन्त में वापस ले लिया गया I महर्षियों ने तपस् के द्वारा, स्वयंभू (ब्रह्मा) की अनुमति से, प्रलयावस्था में छिपे हुए वेदों को इतिहास के साथ पाया I"

वेद, प्रत्येक युग के आरम्भ में, उस युग की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संशोधनों के साथ लाए गए I हमारे युग (कलियुग) में भी ऐसा ही हुआ है I

वेदमेकं बहुधा कुरुते हितकाम्यया I अल्पायुषो अल्पबुद्धींश्च विप्रान ज्ञात्वा कलावथ II   - देवी भागवत (::१९)

"तब कलियुग में उसने (व्यास के रूप में विष्णु ने) एक वेद को अनेक भागों में विभाजित कर दिया, जिससे मनुष्यों को लाभ मिल सके - यह जानते हुए कि ब्राह्मण अल्पायु और अल्पबुद्धि होंगे (इसलिए सम्पूर्ण पर प्रभुत्व(mastery) नहीं कर सकेंगे) I"

तो, कलियुग के आरम्भ में एक ही वेद को चार भागों में विभक्त कर दिया गया-ऋग्वेद,यजुर्वेद,सामवेद,अथर्ववेद I

ब्रह्मज्ञान (ज्ञानकाण्ड) की गूढ़ विचारधारा जो ऋग्वेद में है, उसका वैज्ञानिक विधि से, यजन द्वारा प्रस्तुतीकरण - यजुर्वेद में है I वेद- मन्त्रों का केवल शाब्दिक अर्थ निकालना तो सरल है, परन्तु वास्तविक अर्थ अत्यन्त गूढ़ हैं I इसी कारण ऋग्वेद में पहले ही कह दिया गया है :

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः I 

यस्तन्न वेद किम ऋचा करिष्यति इत्तद्विदुस्त इमे समासते II   - ऋग्वेद / १६४ / ३९    

 

 

 

"अविनाशी ऋचाएं परमव्योम में भरी हुई हैं I उनमें सम्पूर्ण देव शक्तियों का वास है I जो इन मूल बीजों (अक्षर ब्रह्म के आठ अरब चौंसठ करोड़ अक्षरों) को नहीं जानता, उसके लिए ऋचा क्या करेगी I जो इस तथ्य को जानते हैं वे ऋचा का सदुपयोग करते हैं I”

अभौतिक (आध्यात्मिक) का प्रतीक ऋक है तथा भौतिक का प्रतीक यजु है I

शब्द-विकास विज्ञान (यास्क द्वारा रचित, जिसे 'निरुक्त' कहा जाता है) के अनुसार "गौशब्द के पांच अर्थ होते है - गाय, किरण, जलधारा, इन्द्रिय एवं वाणी I इसी प्रकार अन्य अनेकों शब्द मन्त्र हैं, जिनकी व्याख्या में त्रुटि हो सकती है I इसलिए, उचित  रीति से ही वेदों के अर्थ का मनन  करना अनिवार्य है, अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो जाएगा I उचित रीति है - वेदों के सभी विभागों का गहनता पूर्वक अध्ययन -अर्थात उस वेद से सम्बंधित उप -भाग (ब्राह्मण ग्रन्थ ,आरण्यक तथा उपनिषद्) के अतिरिक्त पुराणों का भी अध्ययन करने से ही वेदार्थ का सच्चा रहस्योद्घाटन हो पायेगा I 

इतना गम्भीर अध्ययन तो वही कर सकता है जिसके पास पर्याप्त बुद्धि स्तर  हो I जिस मनुष्य के पास केवल शरीर-पोषण  की बुद्धि होती है, वह पशुवत  होता है I उसे वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं है, क्योंकि यह तो अबोध बालक के हाथ में शल्य चिकित्सा के तेज़ चाकू देने जैसे होगा I उसके द्वारा  वेद-मन्त्रों  के अर्थ का अनर्थ करते देर नहीं लगेगी, और मानव जाति का कल्याण उन्नति होकर हानि और अवनति होने लगेगी I      

उपरोक्त स्पष्टीकरण का कुछ आभास नीचे दिए हुए दो मन्त्रों की टिप्पणियों से आभासीकृत हो जाएगा : -

सामवेद / / २७ के एक मन्त्र का वैज्ञानिक अर्थ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा निम्न रूप से उद्धृत है :

अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम I अपां रेतांसि जिन्वति II  

"अग्निदेव द्युलोक से पृथ्वी तक संव्याप्त जीवों के पालनकर्ता हैं, जल को रूप एवं गति देने में समर्थ हैं I" 

[यह भाव वैज्ञानिक सन्दर्भ में भी प्रयुक्त होता है I हाइड्रोजन + ऑक्सीजन + ऊर्जा (अग्नि) से जल उत्पन्न होता है I ऊर्जा ही जल को मेघ बना कर प्रकृति का पोषण करती है I  2H  + O = 2HO (हाइड्रोजन की दो तथा ऑक्सीजन की एक मात्रा = जल ) के सिद्धान्त से सामान्य विज्ञान का विद्यार्थी परिचित होता है, परन्तु उसमें अग्नि(heat) का होना ऋषि की दृष्टि से आवश्यक है और यह तथ्य एक रसायन विज्ञानी के लिए अनजान नहीं है I

विज्ञान जगत में यह तथ्य 'Condensed Superheated Steam' के अन्तर्गत आता है I   

 सामवेद / / ६२ में है :

सखायस्त्वा ववृमहे देवं मर्तास ऊतये I 

अपां पातं सुभगं सुदंससं सुप्रतूर्तिमनेहसम II   


"हे श्रेष्ठकर्मा, उत्तम ऐश्वर्य युक्त, निष्पाप, पापनाशक, पानी को नीचे गिरने देने वाले अग्निदेव !

आपको अपने संरक्षण के लिए प्राप्त करने की कामना हम सभी समान बुद्धि वाले साधक करते हैं I"

[   इस प्रसंग में पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की टिप्पणी है :

'पानी को नीचे गिरने देना - यह विशेषता अग्नि में किस प्रकार है, यह सहजतया समझ से बाहर है I मेघों में जल को अग्नि की ऊर्जा (गुप्त ताप : latent heat) ही सम्भाले रहती  है I  ऊर्जा शान्त हुए बिना वर्षा सम्भव नहीं होती I'

 इस टिप्पणी से अग्नि की उक्त विशेषता विज्ञान बुद्धि वालों के लिए बोधगम्य हो जाती है I  ]

 

महर्षि वेदव्यास ने वेद के चार विभाग करने के पश्चात, उन चार वेदों को चार ऋषियों को सौंप दिया :

ऋग्वेद : पैल ऋषि को  I यजुर्वेद : वैशम्पायन ऋषि को  I सामवेद : जैमिनी ऋषि को  I अथर्ववेद : सुमन्त ऋषि को I

इन चार ऋषियों ने फिर अपनी - अपनी शाखा का विस्तार किया I 

प्रत्येक वेद के भी  चार उप -भाग  हैं : संहिता , ब्राह्मण , आरण्यक , उपनिषद् I

संहिता : सूक्तों का संग्रह, जो आहुतियों के समय उपयोग किया जाता है I

ब्राह्मण : सूक्तों के कर्मकाण्डपरक मन्त्रों की व्याख्या I यज्ञों की नैतिक, सामाजिक, राजनैतिक व्याख्या I वैदिक कर्मकाण्ड का विकास इन्हीं ग्रन्थों से जाना जा सकता है I सृष्टि से सम्बद्ध पौराणिक कथाएं भी ब्राह्मणों में हैं I संहिताओं के प्रतीक अर्थों को ब्राह्मणों में विस्तार से दिया गया है (मत्स्य द्वारा सृष्टि की रक्षा, शुनः शेप की बलि देने से रक्षा, इत्यादि कथाएं) I ब्राह्मण ग्रन्थों में सांस्कृतिक तत्वों का बीज प्राप्त होता है - जैसे सृष्टि की व्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म, स्त्री-महिमा, अतिथि सत्कार, यज्ञ का महत्व, सदाचार, विद्यावंश आदि I 

आरण्यक : कर्मकाण्ड, अनुष्ठान-उत्पत्ति तथा उसके महत्व का चिन्तन I कर्मकाण्ड से सन्यास की ओर ले जाता है I यज्ञक्षेत्रीय ज्ञान-विज्ञान चर्चाएं I याज्ञिक कर्मों के तात्विक एवं औपचारिक भावों की गवेषणा I आरम्भ में ब्राह्मण-ग्रन्थों के साथ उनके अन्तिम भाग के रूप में जुड़े रहते थे I अब ब्राह्मण-ग्रन्थों के अन्त में परिशष्ट के रूप में दिए हुए हैं I इनकी रचना वनों में हुई I वन में रहकर, वैदिक कर्मकाण्ड से पृथक रहकर चिन्तन करनेवाले ऋषियों ने उनमें प्रतीक खोजने की चेष्टा की I आरण्यकों में यज्ञ के अन्तर्गत अध्यात्मवाद का पल्लवन है I आगे चलकर इन्हीं से मीमांसा, दर्शन, धर्मशास्त्र, कर्मवाद विकसित हुए I आरण्यकों में यज्ञों के विधान के साथ-साथ उपनिषदों के ज्ञानकाण्ड की भूमिका भी तैयार की गयी I 

चारों वेदों के आरण्यकों (ऐतरेय, कौषीतकि, मैत्रायणी आदि ) में अपनी -अपनी शाखाओं से सम्बद्ध कर्मों का विचार किया गया है I तथापि सन्यासधर्म का महत्व सर्वत्र बतलाया गया है I इसे जान कर मनुष्य मुनि बन जाता है I  आत्मा 


को जान कर वह  ब्रह्मलोक की कामना करते हुए परिव्राजक बन पुत्र , वित्त एवं लोक की एषणा (इच्छा ) का त्याग करता है , तथा भिक्षाचर्या करता है I 

उपनिषद् : दार्शनिक विचार I मौलिक उपनिषद् १३ I कोई-कोई महानारायण उपनिषद जोड़कर १४ कहते हैं I परन्तु कालान्तर में १०० से अधिक हो गए, जिनमें विभिन्न मतावलम्बियों ने अपने धर्मों का सार प्रकट किया I परन्तु वैदिक साहित्य से उनका सम्बन्ध नहीं हो सकता I उपनिषदों में प्रायः संवादों के द्वारा तत्वज्ञान समझाया गया है I पुरुष के शरीर में प्राण आदि की प्रतिष्ठा, आत्मा से सृष्टि की उत्पत्ति,विद्या और अविद्या का अन्तर, जगत और आत्मा के स्वरुप, ब्रह्मतत्व इत्यादि I कहीं प्रश्नोत्तर, तो कहीं दृष्टान्तों के द्वारा इन विषयों का निरूपण किया गया है I गद्य और पद्य दोनों ही का प्रयोग किया गया है I उपनिषदों के आधार पर वेदान्त-दर्शन का विकास हुआ, जिसके फलस्वरूप बादरायण ने ब्रह्मसूत्र की रचना की I ब्रह्म के तीन लक्षण हैं - सत, चित, आनन्द I इन तीनों की व्याख्या उपनिषदों में सम्यक् रूप से की गई है I

वेद, पहले-पहल ऋषियों द्वारा अपनी -अपनी शाखाओं  में  गुरु - शिष्य परम्परा के अनुरूप उच्चारित किये जाते थे I गुरुवाक्यों को  शिष्य दोहराते  थे  , जब तक कि सबकुछ अच्छी प्रकार से कण्ठस्थ हो जाए I  इस रीति से अध्ययन  - अध्यापन होता था I आरम्भ में वंशजों को वेद उत्तराधिकार के रूप में दिए गए थे I बाद में बाहर से शिष्य(ब्रह्मचारी, जो जीवन के पहले आश्रम "ब्रह्मचर्य आश्रम” में प्रवेश करते थे ) भी आकर शिक्षा ग्रहण करने लगे I ये गुरु के परिवार के सदस्यों की भांति ही रहते थे , और इस  परिवार को "गुरुकुल " कहा जाता था  I

"गोत्र " का तात्पर्य “गोठ” से है, जहां गायें एक साथ बाँधी जाती हैं (herd of cows) I सम्भवतः बाद में इसका भावार्थ विकसित हुआ : herd within an enclosure - "वह कमरा या कक्षा जहां शिष्यसमूह बैठकर एक गुरु से शिक्षा ग्रहण करता हो” I इस प्रकार, एक ही गोत्र में शिक्षा ग्रहण करनेवाले ब्रह्मचारी  सगोत्री कहलाये और इस नाते से ये आपस में गुरु - भाई होते थे I

कालान्तर में, कण्ठस्थ करने के अतिरिक्त वेदों का संकलन भी किया जाने लगा I किसी भी काल में सारे मन्त्र एक साथ नहीं बने I ऋषियों और उनके वंशजों ने कई हज़ार वर्षों में ये बनाये I वेदों को 'अपौरुषेय' कहने का तात्पर्य भी यही है कि  ये किसी एक व्यक्ति द्वारा संकलित नहीं किये गए I

 इस प्रकार सबसे पहले ऋग्वेद का लिखित रूप अस्तित्व में आया, फिर समय बीतने के साथ सर्वप्रथम ऋग्वेद संहिता (मन्त्र-संग्रह) की रचना हुई I इसके पश्चात उसके मन्त्रों की व्याख्या का काल आया और ब्राह्मण-ग्रन्थ बने I तत्पश्चात आरण्यकों की रचना हुई I अन्त में उपनिषद् बने I इसी क्रम में यजुर्वेद, सामवेद, एवं अथर्ववेद बने I यह इस क्रम-व्यवस्था का सिंहावलोकन मात्र है : सब वेदों की संहिताएं,ब्राह्मण व आरण्यक क्रमवार नहीं बने I ऋग्वेद-संहिता के बादवाले वेदों की संहिताएं और ब्राह्मण-ग्रंथों के संकलन के कालखण्डों का परस्पर आच्छादन भी हुआ है, क्योंकि एक का कालखण्ड समाप्त होते-होते दूसरे का आरम्भीकरण हो जाता था I)

वेदों के बाद इतिहास (रामायण एवं महाभारत), पुराण, काव्य, नाटक, गद्य, पद्य, आख्यायिका, स्मृति (मनुस्मृति आदि) एवं तन्त्र रचे गए I

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