हिन्दू
धर्म
स्वामी विवेकानन्द ( १९ सितम्बर १८९३ ,19 September 1893 )
[ विश्व धर्म
संसद, शिकागो में अंग्रेजी में दिया गया भाषण, जिससे संसार को पहली बार हिन्दुत्व (वैदिक/सनातन
धर्म) के बारे में उचित जानकारी और स्पष्टीकरण मिले I पहला भाषण उन्होंने धन्यवाद के
रूप में ११ सितम्बर १८९३ को दिया था जिसमें उनके पहले शब्द थे "Sisters and
Brothers of America" ]
मूल अंग्रेजी
भाषण PAPER ON HINDUISM का हिन्दी अनुवाद
{ स्पष्टता
और शुद्धता के लिए कहीं-कहीं वास्तविक अंग्रेजी शब्दों को विकल्प (bracket) में दिया
गया है }
इस समय विश्व में ऐसे तीन धर्म स्थापित हैं जो
प्रागैतिहासिक काल से चल कर हम तक पहुंचे हैं – हिंदुत्व, जरथुस्त्र का धर्म (पारसी),
और यहूदी धर्म I ये सब भयंकर थपेड़े झेल चुके हैं, और अपने बचे रहने से, अपनी आन्तरिक
शक्ति को सिद्ध करते हैं I परन्तु यहूदी धर्म, ईसाई धर्म को अपने में समाहित करने में
असमर्थ रहा और अपनी ही जन्मस्थली से, अपनी ही सर्वविजेता संतान (ईसाई धर्म) द्वारा
निष्कासित कर दिया गया I अब उसी महान यहूदी धर्म की गाथा कहने को मुठ्ठीभर पारसी लोग
रह गए हैं I
भारत में एक-के -बाद-एक धार्मिक पंथ उभरते गए,
और लगा कि ये सब वैदिक धर्म को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे I पर जिस तरह भीषण भूकम्प के समय
समुद्र तट की लहरें पहले तो कुछ समय के लिए पीछे हट जाती हैं, फिर हज़ार गुने वेग से
अपने में सब कुछ समाहित कर लेने वाली बाढ़ बन कर आती हैं - इसी तरह यह कुछ समय के लिए
पीछे हट गया, और जब इस बाढ़ की उथल -पुथल समाप्त हो गयी, तब ये सारे पंथ, आस्था की विराट
मुख्य धारा में खिंच कर, उसी में विलय हो कर, समाहित कर लिए गए I
वेदान्त दर्शन की ऊंची उड़ानों (विज्ञान की नवीनतम
खोजें जिसकी प्रतिध्वनि-सी प्रतीत होती है) से लेकर मूर्तिपूजा जैसी निचले स्तर की
विचारधारा तक, एवं उसकी अनेकों पौराणिक कथाओं तक, बौद्धों के नास्तिकवाद तथा जैनों
के अनीश्वरवाद तक, हिन्दू व्यक्ति के धर्म में सबके लिए स्थान है I
तब यह प्रश्न उठता है कि इन सब इतने सारे अलग
परिधियों (circumferences) पर जाते अर्द्धव्यासों (radii) के एक स्थान पर मिलने का
कोई एक, अकेला, सर्वमान्य केन्द्र कहाँ पर है? वह समान आधार (common basis) कहाँ पर
है, जिसके ऊपर ये सारे, विचारहीन से दीखते विरोधाभास आकर टिक सकें?
और यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर देने की मैं
चेष्टा करूंगा I
२
हिन्दुओं को उनका धर्म प्राप्त हुआ है – वेदों
के प्रकटीकरण(revelation) के द्वारा I वे मानते हैं कि वेदों का न आदि है, न अन्त
I इस श्रोता मंडली को यह असंगत लग सकता है कि कोई पुस्तक बिना आरम्भ या अन्त के कैसे
हो सकती है I परन्तु वेदों का तात्पर्य पुस्तकें नहीं हैं I उनका तात्पर्य है आध्यात्मिक
नियमों का वह खज़ाना जो विभिन्न व्यक्तियों द्वारा, विभिन्न कालखंडों में संचित किया
गया है I जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण के नियम, उसकी खोज के पहले से ही विद्यमान थे, और
आगे भी रहेंगे - भले ही सारी मानवजाति उन्हें भूल जाए - उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत
पर भी यही बात लागू होती है I एक आत्मा और दूसरी आत्मा के नैतिक एवं आध्यात्मिक सम्बन्ध
(moral, ethical, spiritual), तथा एक आत्मा और समस्त आत्माओं के पिता के बीच यही
सम्बन्ध रहेंगे, भले ही उन्हें हम भूल
भी जाएँ I
इन नियमों के खोजकर्ता ऋषि कहलाते हैं, और हम उन्हें पूर्ण व्यक्तित्व वाले पुरुष का सम्मान सम्मान देते हैं I मुझे यह कहते हुए हर्ष होता है
की इनमें से जो सर्वोच्च थे, उनमें कुछ स्त्रियां भी थीं I यहां पर यह कहा जा सकता
है कि इन नियमों का अन्य नियमों की तरह कोई अन्त तो नहीं है, परन्तु उनका आरम्भ अवश्य
रहा होगा I वेद हमें बताते हैं कि सृष्टि का न आदि है, न अन्त I विज्ञान ने यह सिद्ध
कर दिया है कि आकाशीय ऊर्जा
(cosmic energy) का कुल योग सदैव एक-सा ही रहता है I तो, यदि कभी कोई ऐसा समय था जब किसी भी वस्तु का अस्तित्व
नहीं था, तब यह सारी प्रकटित ऊर्जा (manifested energy) कहाँ पर थी ? कुछ लोग कहते
हैं कि यह ईश्वर में गुप्त / समर्थ रूप (potential form) में थी I ऐसी स्थिति में परमात्मा
कभी गुप्त / समर्थ (potential) और कभी प्रकट / गतिमान (kinetic) होता है, जो उसे परिवर्तनशील
(mutable) बना देगा I और जो कुछ भी परिवर्तनशील है, वह एक यौगिक (compound) होता है
I प्रत्येक यौगिक को एक परिवर्तन से होकर गुजरना होगा I इस परिवर्तन को कहते हैं -
विनाश I तब तो ईश्वर की मृत्यु हो जायेगी I पर ऐसा कहना तो मूर्खता है I इसलिए, ऐसा
कोई समय ही नहीं था जब सृष्टि (creation) नहीं थी I
यदि
मुझे तुलना करने की छूट मिले, तो मैं यह कहूँगा की सृष्टि(creation) और सृष्टा(creator)
दो ऐसी रेखाएं हैं, जिनका न आदि है, न अंत - वे दोनों एक दूसरे के समानान्तर
(parallel) हैं I ईश्वर एक सदैव से सक्रिय रहनेवाली दूरदर्शिता है, जिसकी शक्ति के
द्वारा हलचल(chaos) के अन्दर से एक–के-बाद-एक
व्यवस्थाएं(order) विकसित होती चली जा रही हैं, जो एक निश्चित सीमा तक चलने के बाद
नष्ट हो जाती हैं I और इसी बात को ब्राह्मण बालक प्रतिदिन दोहराता है - "इस सूर्य
और चन्द्र को ईश्वर ने पिछले चक्रों के सूर्यों और चंद्रों के समान बनाया I" और,
यह तथ्य आधुनिक विज्ञान से मेल खाता है I
३
मैं यहां पर खड़ा हूँ I यदि मैं आाँखें बन्द कर
के अपने अस्तित्व के बारे में सोचने का प्रयत्न करूँ, और कहूँ -"मैं,मैं
" - तो कौन सा विचार सामने उभरता है? - शरीर का विचार I तो क्या मैं केवल भौतिक
पदार्थों का एक संयोग मात्र हूँ, और कुछ भी नहीं? वेद कहते हैं "नहीं "
I मैं शरीर के अन्दर रहनेवाली एक आत्मा हूँ - मैं शरीर नहीं हूँ I शरीर मृत हो जाएगा,
पर मैं नहीं मरूँगा I मैं यहां पर इस शरीर
में हूँ - एक दिन यह गिर जाएगा, पर मैं जीवन को जीता रहूंगा I मेरा एक अतीत भी है
I आत्मा की सृष्टि कभी नहीं हुई थी, क्योंकि सृष्टि का अर्थ है - एक संयोग, और उसका अर्थ है - भविष्य में
अवश्य ही उसका विलय(dissolution) हो जाएगा I तो, यदि आत्मा की सृष्टि हुई थी, तो अवश्य
ही उसकी मृत्यु हो जायेगी I कुछ लोग जन्म से ही सुखी होते हैं, स्वस्थ शरीर के द्वारा
उत्तम स्वास्थ्य का भोग करते हैं,
उनमें मानसिक ओज होता है, और उनकी सारी इच्छाओं
की पूर्ति होती है I अन्य लोग भाग्यहीन, दुखी पैदा होते हैं, कुछ के हाथ-पैर नहीं होते,
कुछ बुद्धिरहित होते हैं, और एक दुर्भाग्यपूर्ण अस्तित्व का बोझ ढोते हुए घिसटते रहते
हैं I ऐसों का जन्म ही क्यों हुआ? क्यों एक न्यायप्रिय और दयालु इश्वर ने एक को सुखी
और दूसरे को दुखी बनाकर उत्पन्न किया? वह क्यों इतना पक्षपातपूर्ण है? और इससे यह सान्त्वना
भी तो नहीं मिल पाएगी कि जो इस जन्म में दुखी हैं, वे भविष्य में सुखी हो जाएंगे I
न्यायप्रिय और दयालु ईश्वर के साम्राज्य में मनुष्य दुखी और अभागा होता ही क्यों है?
दूसरी बात - सृष्टिकर्ता ईश्वर की कल्पना ऐसी
अनियमितता का स्पष्टीकरण नहीं करती, वरन एक सर्वशक्तिमान का क्रूर आदेश ही व्यक्त करती
है I तब तो, मनुष्य के जन्म से पहले ही कुछ ऐसे कारण रहे होंगे, जो उसे दुखी या सुखी बनाते हैं - और वे थे
उसके पिछले कर्म I
क्या मन और शरीर के सारे झुकावों के लिए आनुवांशिकता(heredity)
उत्तरदायी नहीं है? यहां पर अस्तित्व की दो समानान्तर रेखाएं हैं - एक मन की, दूसरी
तत्व (पदार्थ ) की I हमारे पास जो कुछ भी है, यदि उसका उत्तर पदार्थ और उसके रुपान्तरण
में ही है, तब तो आत्मा के अस्तित्व को मानने की कोई आवश्यकता ही नहीं है I परन्तु
यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि पदार्थ से विचार का विकास हुआ है I और यदि दार्शनिक
दृष्टि से अद्वैतवाद(monism) अनिवार्य ही हो, तब तो आत्मा – सम्बन्धी अद्वैतवाद निश्चय
ही तर्कसंगत है, और भौतिक अद्वैतवाद से किसी भी हाल में कम स्वीकार्य नहीं है I पर,
इन दोनों में से कोई भी यहां पर आवश्यक नहीं है I
हम इस बात को नकार नहीं सकते कि अलग-अलग शरीर
आनुवांशिकता (heredity) के कारण कुछ विशेष प्रवृत्तियों(tendencies) को प्राप्त करते
हैं I पर प्रवृत्तियों का अर्थ है - केवल भौतिक संरचना (physical configuration), जिसके
द्वारा एक मनविशेष, एक विशिष्ट प्रकार से कार्य करता है I दूसरे
४
प्रकार के झुकाव जो एक विशिष्ट आत्मा में ही होते हैं, वे उसके
पिछले कर्मों से उत्पन्न होते हैं I विशिष्ट प्रकार की प्रवृत्ति (स्वभाव) लिए हुए
एक आत्मा, संयोग के नियमों के द्वारा, किसी शरीर में जन्म लेती है - जो उस स्वभाव को
प्रदर्शित करने का सबसे सुयोग्य साधन है I यह विज्ञान के अनुरूप है, क्योंकि विज्ञान
स्वाभाविक रूप से सबकुछ की व्याख्या करने की प्रवृत्ति रखता है, और पुनरावृत्ति (बार-बार
दोहराना,repetitions), प्रवृत्ति (स्वभाव) बनाती है I तो, एक नवजात आत्मा की स्वाभाविक,
प्राकृतिक प्रवृत्तियों की व्याख्या करने के लिए पुनरावृत्तियों की आवश्यकता है I और,
चूंकि पुनरावृत्तियाँ इस वर्तमान जन्म में तो मिली नहीं थीं - तो अवश्य ही ये पिछले
जन्मों से आई हैं I
एक और सुझाव है - इन सब बातों को मान भी लें,
तो भी ऐसा क्यों है कि मुझे अपने पूर्वजन्म की कोई भी बात का स्मरण नहीं है? इसे तो
सरलता से समझाया जा सकता है - अभी इस समय मैं अंग्रेजी में बोल रहा हूँ I यह मेरी मातृभाषा
नहीं है I वास्तव में, मेरी चेतना में मेरी मातृभाषा का कोई भी शब्द इस समय नहीं है
I पर यदि मैं उन शब्दों को मन में लाने का प्रयत्न करता हूँ - तो वे वेग से चले आते
हैं I यह इस बात को दर्शाता है कि चेतना (consciousness), मनरूपी महासार की सतह मात्र
है, और इसकी गहराइयों में हमारे सारे अनुभवों का भण्डार है I प्रयत्न करें, और संघर्ष
करें - वे बाहर आ जाएंगे, और आप अपने पिछले जन्म के प्रति सचेत हो उठेंगे I
यह एक सीधा -सादा सा और प्रदर्शन(demonstration)
देनेवाला साक्ष्य है I किसी सिद्धान्त को सत्यापित करने का सबसे उचित(perfect) साक्ष्य
है - उसकी जांच करना I और यही ऋषियों द्वारा
संसार को चुनौती है I हमने उस रहस्य की खोज कर ली है जिससे स्मृति के महासागर की गहराइयों
को झकझोरा जा सकता है - इसे कर के देखें और आपको अपने पिछले जीवन की संपूर्ण स्मृति
प्राप्त हो जायेगी I
तो, हिन्दू यह विश्वास करता है कि वह एक आत्मा
है I उसे न तलवार काट सकती है, न अग्नि जला सकती है, न जल गला सकता है, न ही हवा सुखा
सकती है I
[ नैनं
छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः I
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः II भगवद्गीता २ / २३ ]
हिन्दू यह मानता है कि प्रत्येक आत्मा एक वृत्त(circle)
है, जिसकी परिधि(circumference) कहीं पर भी नहीं है, परन्तु जिसका केन्द्र शरीर में
स्थित है - और मृत्यु का अर्थ है, उस केन्द्र का एक शरीर से दूसरे शरीर में चले जाना
I आत्मा, पदार्थ की स्थितियों(conditions of matter) से सीमित (बंधी हुई)
५
नहीं है I संक्षेप में - वह मुक्त है, पवित्र
है और सम्पूर्ण(perfect) है I पर, किसी कारण से यह अपने - आपको पदार्थ से बंधा
हुआ पाती है - और स्वयं को पदार्थ(matter) ही समझती भी है I
अगला प्रश्न उठता है - एक उन्मुक्त, संपूर्ण
तथा पवित्र अस्तित्व, पदार्थ की पराधीनता में क्यों रहे? एक आत्मा जो अपने-आपमें संपूर्ण
है, इस भ्रमपूर्ण विश्वास में क्यों पड़ जाती है कि वह दोषपूर्ण (imperfect) है? हमें
बताया गया है कि हिन्दू लोग इस प्रश्न से कतराते हैं, और यह कहते हैं कि ऐसा कोई प्रश्न
हो ही नहीं सकता I कुछ विचारक इसका उत्तर पूर्णज्ञानी जैसा बनकर देना चाहते हैं, और
बड़े-बड़े वैज्ञानिक नामों का उपयोग करके इस कमी को पूरा करने का प्रयत्न करते हैं I
परन्तु नाम रखने को तो व्याख्या नहीं कहा जा सकता, और प्रश्न वहीं-का-वहीं रह जाता
है I जो संपूर्ण(perfect) ही है, वह सम्पूर्ण-वत(quasi-perfect) कैसे हो सकता है I
जो पवित्र है,संपूर्ण(absolute) है, वह स्वयं के न्यूनतम कण तक के स्वभाव को भी कैसे
बदल सकता है ? पर हिन्दू सच्चा है - वह आडम्बरपूर्ण तर्कों की आड़ में नहीं रहना चाहता
I वह इन प्रश्नों का दिलेरी से सामना करने की क्षमता रखता है, और उसका उत्तर होता है,
"मैं नहीं जानता I मैं नहीं जानता कि कैसे एक सम्पूर्ण आत्मा अपने - आपको अपूर्ण
समझने लग गयी, और मानने लगी कि वह पदार्थ से जुड़ी हुई है, उससे चालित(conditioned)
है I" परन्तु तथ्य तो तथ्य है I यह एक तथ्य है कि प्रत्येक मनुष्य की चेतना में
वह अपने-आपको मात्र एक शरीर समझता है I हिन्दू
इस बात की व्याख्या करने की चेष्टा नहीं करता कि मनुष्य अपने-आपको मात्र शरीर ही क्यों
समझता है I यदि इसका उत्तर यह दिया जाय कि यह तो परमात्मा की इच्छा है, तो यह तो कोई
व्याख्या नहीं हुई I यह इससे अधिक कुछ नहीं है, जैसे हिन्दू कहे, "मैं नहीं जानता
I"
तो, आत्मा अजर और अमर है, संपूर्ण है व अनन्त
है, और मृत्यु का अर्थ है केवल उस केन्द्र का एक
शरीर से दूसरे में स्थानान्तरण I हमारा वर्तमान, हमारे अतीत द्वारा
निर्धारित होता है, और हमारा भविष्य हमारे वर्तमान द्वारा I आत्मा का विकास
ऊपर की ओर होता रहेगा, या फिर लौट कर एक जन्म से दूसरे जन्म की ओर, एक मृत्यु से दूसरी
मृत्यु की ओर I पर यहां एक प्रश्न और उठता है :- क्या मनुष्य तूफ़ान में फंसी हुई छोटी
सी नौका है, जो एक क्षण तो बड़ी सी समुद्री लहर के उठान पर होती है, और अगले ही क्षण
मुंह फाड़े खाई - जैसी गहराई में - अच्छे और बुरे कर्मों की दया पर आगे-पीछे लुढ़कते
हुए - एक शक्तिहीन, असहाय, पस्त व्यक्ति जो एक क्रोधी, आक्रामक, कोई समझौता न करने
वाली कारण तथा परिणाम की धारा में पड़ा हुआ है, कारण-चक्र (causation) में पड़ा हुआ एक
छोटा सा कीड़ा है I वह चक्र, जो अपनी राह में आने वाली प्रत्येक वस्तु को कुचलकर रख
देता है, वह किसी विधवा के अश्रु या किसी अनाथ
के रुदन को देखने की प्रतीक्षा नहीं करता I इस विचार को सोचने मात्र से दिल दहल जाता
है, पर यही तो प्रकृति का नियम है I
६
क्या कहीं कोई आशा की किरण नहीं, कोई बचने का
रास्ता नहीं? यही वह पुकार थी जो निराश ह्रदय की की गहराइयों से निकली, दया के सिंहासन
तक पहुंची, और आशा एवं सांत्वना से भरे शब्द नीचे उतरे I इन शब्दों ने एक वैदिक ऋषि
को प्रोत्साहित किया I वह उठकर संसार के सम्मुख खड़ा हो गया और उसने इस आनंदपूर्ण सूचना
का सुदीर्घ उद्घोष किया,"ओ अमर आनन्द की संतानों ! सुनो !! और तुम भी - जो उच्चस्तरीय
मंडलों में निवास करते हो I मुझे वह पुराण पुरुष मिल गया है, जो समस्त अन्धकार, समस्त
भ्रान्तियों से परे है - उसे जान लेने मात्र से तुम बार-बार होने वाली मृत्यु से बच
जाओगे I“
अमर आनन्द की संतानों (children of immortal
bliss) - क्या ही मधुर और आशा से परिपूर्ण नाम है ! बंधुओं ! मुझे आप को इस मधुर नाम से बुलाने की अनुमति
दें - अमर आनन्द के वारिस – हाँ ! हिन्दू आप लोगों को पापी नहीं कहता I आप परमात्मा
के पुत्र हैं - अमर आनन्द के भागीदार - पवित्र और पूर्ण व्यक्तित्व I धरती पर दैवीय
अस्तित्व और पापी ! मनुष्य को ऐसा कहना ही स्वयं में पाप है I यह तो मानव-स्वभाव पर
सरासर आरोप है I आओ, ओ सिंहों, और इस भ्रम को झटक कर फ़ेंक दो कि तुम कोई भेड़ - बकरी
हो I तुम अमर आत्मा हो, उन्मुक्त, धन्य(blest) और शाश्वत(eternal) I तुम पदार्थ नहीं,
तुम शरीर भी नहीं I पदार्थ तुम्हारा सेवक है, न कि तुम पदार्थ के सेवक I
तो, वेद कोई क्षमा न देनेवाले नियमों का डरावना-सा
समूह नहीं है, और न ही कभी न समाप्त होनेवाला कारण - परिणाम रुपी कारगर है I वरन, इन
सब नियमों के ऊपर, व पदार्थ के कण तथा बल के परे, केवल "एक" है I उसके आदेश
पर हवा बहती है, अग्नि प्रज्ज्वलित होती है, मेघ वर्षा देते हैं, और मृत्यु पीछा करते
हुए पृथ्वी पर आती है I
और उस
"एक" की प्रकृति कैसी है?
"वह" सर्वत्र व्याप्त है - पवित्र, निराकार, सर्वशक्तिमान,
करुणामय I
"तू हमारा पिता है, तू हमारी माता है, तू
हमारा मित्र है Iतू समस्त शक्ति का स्त्रोत है - हमें शक्ति दे I तू ही है, जो सम्पूर्ण
ब्रह्माण्ड का भार वहन करता है - हमें इस जीवन के छोटे से भार को वहन करने में सहायता
कर I" - यह वैदिक ऋषियों ने गाकर कहा था I
और "उस" की आराधना करें कैसे : - प्रेम
के द्वारा I
"उसकी आराधना ऐसे करो जैसे किसी प्रेमी की,
जो इस जन्म या और अगले जन्म की सारी वस्तुओं से भी अधिक प्यारा हो I"
७
प्रेम का यही सिद्धान्त(doctrine) वेदों द्वारा
उद्घोषित है I आइये, देखें इसे किस प्रकार कृष्ण द्वारा पूर्णतः विकसित करके बताया
गया - उन कृष्ण द्वारा जिन्हें हिन्दू लोग ईश्वर का अवतार मानते हैं I
उन्होंने बताया कि मनुष्य को इस संसार में कमल
के पत्ते की भांति रहना चाहिए, जो पानी के अंदर तो उगता है, पर कभी भी पानी से गीला
नहीं होता I इसी तरह ही मनुष्य को संसार में रहना चाहिए - ह्रदय तो परमात्मा की ओर
हो, और हाथ कर्म की ओर I
फल-प्राप्ति (इस संसार में अथवा दूसरी दुनिया
में) की आशा से परमात्मा से प्रेम करना अच्छी बात है, पर उससे भी अधिक अच्छा है - प्रेम
के लिए ही परमात्मा से प्रेम करना I और यह प्रार्थना है, "भगवान, मैं धन-दौलत,
बाल-बच्चे,गया कुछ भी नहीं मांगता I यदि तेरी इच्छा हो तो मैं जन्म लेता चला जाऊंगा,
पर मुझे वरदान दे कि मैं फल की इच्छा के बिना तुझे प्रेम करता चला जाऊं - स्वार्थरहित
होकर - केवल प्रेम के लिए I”
कृष्ण के एक शिष्य को, जो उस समय भारत का राजा
था, उसके शत्रुओं ने उसके ही राज्य से बाहर खदेड़ दिया I तब उसे अपनी रानी सहित हिमालय
में एक वन में शरण लेनी पड़ी I एक दिन रानी ने पूछा कि उस जैसे महान सदाचारी व्यक्ति
को इतना कष्ट क्यों सहन करना पड़ रहा है? तब युधिष्ठिर (राजा ) ने कहा, "देखो रानी,
ये हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएँ कितनी भव्य और सुन्दर हैं I मैं इन्हें प्रेम करता हूँ
I ये मुझे कुछ देते नहीं, पर मेरा स्वभाव है कि मैं भव्यता और सुन्दरता से प्रेम करूँ
I इसीलिये मैं इनसे प्रेम करता हूँ I उसी प्रकार, मैं परमात्मा से प्रेम करता हूँ
I वह सारी सुन्दरता, सारी उच्चता(sublimity) का स्त्रोत है I प्रेम करने योग्य वही
एकमात्र है I मेरा स्वभाव है उसे प्रेम करना, इसलिए मैं प्रेम करता हूँ I किसी वस्तु(object)
के लिए प्रार्थना नहीं करता, न ही कुछ मांगता हूँ I वह जहां चाहे, मुझे रख दे I मैं
उसे प्रेम करूंगा - केवल प्रेम ही के लिए I प्रेम में मैं सौदेबाज़ी नहीं कर सकता I"
वेद हमें बताते हैं कि आत्मा देवतुल्य(divine)
है I वह बंधी हुई है तो केवल पदार्थ(matter) के बंधन में I सम्पूर्णता तब प्राप्त होगी
जब यह बन्धन फट पड़ेगा I इसके लिए वेदों में एक शब्द आया है - "मुक्ति" -
अपूर्णता के बंधनों से मुक्ति, मृत्यु और संकट से मुक्ति I
यह बन्धन तो केवल ईश्वर की कृपा से ही खुलेगा,
और यह पवित्र (pure) लोगों पर आती है I तो "उस" की दया पाने की शर्त है
- पवित्रता(purity) I यह दया कैसे कार्य करती है? "वह" स्वयं को प्रकट करता है - एक पवित्र ह्रदय के सम्मुख I पवित्र और कलंक-रहित
लोग ही ईश्वर का दर्शन कर पाते हैं - वह भी
८
इसी जन्म में I और केवल तब ही ह्रदय की समस्त
कुटिलता का निवारण हो जाता है - सारी शंकाओं का समाधान हो जाता है, और मनुष्य कर्म
के भयंकर नियम का शिकार नहीं रह जाता I यही हिन्दू धर्म के सर्वाधिक महत्वपूर्ण विचारबिन्दु
का केन्द्र है I हिन्दू व्यक्ति शब्दों और सिद्धान्तों पर ही निर्भर नहीं रहना चाहता
है I यदि इन्द्रियों के संज्ञान के अस्तित्व के पार भी कोई अस्तित्व होते हैं, तो वह
उनका सामना करना चाहता है I यदि उसके अंदर आत्मा है - जो कि पदार्थ नहीं है - और यदि
सारे संसार के प्रति करुणा से पूर्ण कोई विश्वव्यापी आत्मा है, तो वह सीधा उस ओर ही
जायेगा और उसका दर्शन करेगा I तभी उसकी सारी शंकाएं नष्ट हो पाएंगी I इसलिए, एक हिन्दू
ऋषि आत्मा के लिए, परमात्मा के लिए, सबसे अच्छे ढंग से प्रमाण देता है :- "मैंने
आत्मा को देखा है I मैंने परमात्मा को देखा है I" और यही तो सम्पूर्ण होने की
एकमात्र शर्त है I हिन्दू धर्म में किसी विशेष धार्मिक विश्वास, या आँख मूंदकर माननेवाले
आदेश का पालन करने का संघर्ष और प्रयत्न करना नहीं है, वरन आत्मज्ञान
(self-realisation) है - विश्वास करना भर नहीं, वरन वास्तव में होना और बन जाना है
I
हिन्दुओं की प्रणाली का समस्त उद्देश्य है -
सम्पूर्ण बनने के लिए सतत संघर्ष, दैवीय(divine) बनना, परमात्मा तक पहुंचना, उसका दर्शन
करना I इस तरह से परमात्मा तक पहुँचने, उसका दर्शन करने ,सम्पूर्णता प्राप्त करने
(वह आकाश-स्थित परमात्मा जो स्वयं सम्पूर्ण है) के द्वारा निर्मित होता है हिन्दुओं
का धर्म I
और, जब मनुष्य पूर्णत्व(perfection) को प्राप्त
हो जाता है, तब उसका क्या होता है? तब वह एक ऐसा जीवन जीता है, जो असीम आनन्द(bliss
infinite) से युक्त होता है I वह अनन्त तथा परिपूर्ण आनन्द का भोग करता है, क्योंकि
उसे वह वस्तु मिल चुकी है, जिसमें उसे आनन्द लेना चाहिए - और वह है ईश्वर I और वह ईश्वर
में आनन्द की प्राप्ति करता है I
इस पड़ाव तक तो सभी हिन्दू एकमत हैं I यह भारत
के सभी सम्प्रदायों का सार्वजनिक धर्म है I परन्तु, पूर्णत्व (perfection) तो परम (absolute) है, और
परम एक ही होता है, दो या तीन नहीं I उसके कोई गुण नहीं हो सकते, और वह कोई व्यक्ति
(individual) भी नहीं हो सकता I इसलिए, जब कोई आत्मा सम्पूर्ण व शुद्ध बन जाती है,
तो उसे ब्रह्म से एकाकार हो जाना होता है I तब उसे यही ज्ञान होता है - केवल ईश्वर
ही सम्पूर्ण है, उसके अपने स्वभाव की वास्तविकता व अस्तित्व क्या है, निरपेक्ष ज्ञान
(absolute knowledge) का अस्तित्व क्या है, व विशुद्ध आनन्द क्या है I हमने इसे अनेकों
बार पढ़ा है, और इसको हम अपना व्यक्तित्व खोने के नाम से जानते हैं, जिसके चलते हम ठूंठ
या पत्थर जैसे बन जाते हैं I
९
"वह उन दाग-धब्बों पर व्यंग्य करता है, जो कभी
घाव जैसे प्रतीत ही नहीं हुए" (“He jests at scars which never felt a wound”)
मैं आपसे कहता हूँ कि ऐसा कुछ नहीं है I यदि इस छोटे-से शरीर की चेतना का आनन्द लेना
ही वास्तविक आनन्द है, तब तो दो शरीरों की चेतना का आनन्द लेने में अवश्य ही अधिक आनन्द
मिलना चाहिए - और यह आनन्द शरीरों के बढ़ते जाने पर उनकी चेतनाओं में बढ़ता ही जाना चाहिए
I और परम आनन्द का यह उद्देश्य तब पूरा हो जब यह चेतना एक विश्वव्यापी चेतना बन जाए
I
इसलिए, इस अनन्त विश्वव्यापी व्यक्तित्व(infinite
universal individuality) को पाने के लिए दुःख से परिपूर्ण इस छोटे से कारागार - एकल
व्यक्तित्व - को हटाना होगा I मृत्यु का अन्त तभी होगा, जब मैं जीवन से एकाकार हो जाऊंगा
I दुखों का अन्त केवल तभी होगा, जब मैं आनन्द के साथ एकाकार हो जाऊंगा I त्रुटियों
का अंत तब होगा जब मैं ज्ञान के साथ एकाकाjर हो जाऊंगा : यह एक अनिवार्य वैज्ञानिक
निर्णय है - विज्ञान ने मेरे समक्ष यह सिद्ध कर दिया है भौतिक अस्तित्व एक भ्रम है,
और मेरा यह शरीर वास्तव में, कभी न भंग होने वाले पदार्थ के महासमुद्र में, एक सतत
परिवर्तनशीलता है I और, अन्तिम निष्कर्ष स्थापित होता है: मेरे दूसरे हिस्से (आत्मा
) को लेते हुए - अद्वैत (एकता,
एक से अधिक के भेदभाव से रहित) में I
एकत्व(unity) को ढूंढ निकालने को ही विज्ञान
कहते हैं I जिस दिन विज्ञान पूर्ण एकत्व(perfect unity) तक पहुँच जाएगा, उसकी आगे की
ओर प्रगति रुक जायेगी, क्योंकि तब वह अपने
गन्तव्य तक पहुँच चुका होगा I रसायन विज्ञान उस दिन आगे प्रगति नहीं कर पायेगा, जिस
दिन वह एक ऐसा तत्व(element) ढूंढ निकलेगा
जिससे बाकी सारे तत्व बन सकें I भौतिकशास्त्र उस दिन ठहर जाएगा, जिस दिन वह अपनी सेवाओं
से इस तथ्य का पता लगा लेगा कि वह ऊर्जा कौन सी है, बाकी सारी ऊर्जाएं जिसकी प्रकटन(manifestation)
मात्र होती हैं I और धर्म-विज्ञान तब पूर्णत्व को प्राप्त कर लेगा, जब वह "उस" का पता लगा लेगा, जो मृत्यु
के संसार में उपस्थित एकमात्र जीवन है I
"वह", जो शाश्वत रूप से बदलते हुए संसार का कभी न बदलनेवाला आधार है, "वह", जो एकमात्र आत्मा है जिसकी
अन्य आत्माएं भ्रमपूर्ण, मायावी प्राकट्य(illusory manifestation) हैं I तो, बहुलता(multiplicity)
और द्वैत(duality) से होकर परम एकत्व(ultimate unity) तक पहुंचा जाता है I धर्म
इससे आगे नहीं जा सकता I सम्पूर्ण विज्ञान का भी यही तो लक्ष्य है I
समस्त विज्ञान को एक-न-एक दिन इसी निष्कर्ष पर
पहुंचना है I आज के विज्ञान की विषयवस्तु है प्राकट्य(manifestation), न कि उत्पत्ति(creation)
I हिन्दू तो इसी बात से प्रसन्न है कि जिस तथ्य
१०
को वह युगों से अपने ह्रदय में संजोये हुए था,
उसे विज्ञान की अधिक सशक्त भाषा में बताया जाने वाला है, और इस पर विज्ञान के ही नवीनतम
निष्कर्षों द्वारा और अधिक प्रकाश डाला जाएगा I
अब हम दार्शनिक महत्वाकांक्षाओं को छोड़ कर नीचे
चलते हैं :- अज्ञानी(ignorant) के धर्म की ओर I मैं पहले ही यह बता दूँ कि भारतवर्ष
में कहीं भी बहु-ईश्वरवाद(polytheism) नहीं है I किसी भी मन्दिर में यदि कोई खड़ा होकर
सुने तो पाएगा कि भक्तगण, मूर्तियों के आगे भगवान के सारे गुणों का गान कर रहे हैं,
जिसमें ईश्वर की सर्वव्यापकताकी भी चर्चा है I इसे समझाने के लिए बहु-ईश्वरवाद(polytheism)
या एकैकाधिदेववाद(henotheism - अनेक देवताओं को स्वतन्त्र मानते हुए सबकी अलग -अलग
पूजा) जैसा नाम नहीं दिया जा सकता I गुलाब के फूल को कोई भी दूसरा नाम दे दें, पर उसकी
सुगंध वैसी ही मधुर रहेगी I नाम कोई व्याख्या नहीं होते I
बचपन में मैंने एक ईसाई धर्म-प्रचारक को भीड़
को उपदेश देते हुए देखा था I अच्छी -अच्छी बातों के अतिरिक्त वह उन्हें यह भी कह रहा था कि यदि वह
उनकी मूर्ति को छड़ी से तोड़ डाले, तो वह मूर्ति क्या कर लेगी? एक श्रोता ने कर्कशता
से उत्तर दिया, "यदि मैं तुम्हारे प्रभु को गाली दे दूँ तो वह क्या कर लेगा?"
"तुम्हें दंड मिलेगा "प्रचारक ने कहा
"जब तुम मर जाओगे I"
हिन्दू पलटकर बोला ,"वैसे ही मेरी मूर्ति
भी तुम्हें दंड देगी, जब तुम मरोगे I"
पेड़ की पहचान उसके फलों से होती है I जब मैंने
मनुष्यों के बीच वे लोग देखे जो मूर्ति-पूजक कहे जाते हैं, और जिनके बराबर नैतिक, आध्यात्मिक
और प्रेमी मैंने और कहीं नहीं देखे, तब मैं ठहर कर अपने-आप से पूछता हूँ, "
क्या पाप पवित्रता को उत्पन्न कर सकता
है?"
मनुष्य का एक बड़ा शत्रु है अन्धविश्वास I पर
धर्मान्धता तो उससे भी बुरी चीज़ है I एक ईसाई गिरजाघर क्यों जाता है? क्रॉस पवित्र
क्यों होता है? प्रार्थना करते समय चेहरा आकाश की ओर क्यों हो जाता है? कैथोलिक चर्च
में बहुत सारी मूर्तियां क्यों होती हैं? प्रार्थना करते समय प्रोटेस्टैंट लोगों के
मन में बहुत सी छवियाँ(images) क्यों होती हैं ? मेरे भाइयों, मन में बिना किसी छवि
का सहारा लिए बिना हम कुछ भी सोच नहीं सकते - वैसे ही जैसे सांस लिए बिना हम जी नहीं
सकते I संयोग के सिद्धान्त(Law of Association) के आधार पर मानसिक विचार में एक भौतिक
प्रतिबिम्ब उभरता है, और वैसे ही भौतिक प्रतिबिम्ब में मानसिक विचार उभरता है I इसी
कारण से, हिन्दू जब आराधना करता है तो किसी बाह्य चिन्ह(external symbol) का प्रयोग
करता है I वह आपसे कहेगा कि इससे उसे,
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उसके मन को उस अस्तित्व पर केन्द्रित(fix) करने में सहायता मिलती
है, जिसकी वह प्रार्थना कर रहा है I वह, और आप यह जानते हैं कि वह मूर्ति परमात्मा
नहीं है, न ही सर्वव्यापी है I वैसे भी, संसार के अधिकतर लोगों के अनुसार सर्वव्यापकता
का कितना महत्व है? - इसका अस्तित्व मात्र एक शब्द, एक चिन्ह के रूप में है I क्या
परमात्मा किसी बाहरी क्षेत्र में है? यदि नहीं, तो जब हम "सर्वव्यापक" शब्द
का प्रयोग करते हैं, तो हमारे विचारों में केवल एक विस्तृत आकाश या अंतरिक्ष ही आता
है, और कुछ नहीं I
येन केन प्रकारेण, हम यह पाते हैं कि अपनी मानसिक
संरचना के नियमों के आधार पर, अनन्तता
(infinity) के बारे में अपने विचारों
को हम नीले आकाश या फिर समुद्र की छवि से जोड़ देते हैं I उसी प्रकार, पवित्रता के विचार
को हम सहज ही गिरजाघर, मन्दिर अथवा क्रॉस से जोड़ लेते हैं I हिन्दुओं ने पवित्रता,
सत्य, सर्वव्यापकता और ऐसे ही अन्य विचार विभिन्न प्रकार की छवियों और रचनाओं के साथ
जोड़े हैं I परन्तु यहां एक भिन्नता है - कुछ
लोग गिरजाघर की मूर्ति की पूजा में सारा जीवन लगा देते हैं, और कभी उससे ऊपर नहीं उठते
- क्योंकि उनके लिए धर्म का अर्थ होता है - बौद्धिक स्तर पर कुछ धार्मिक सिद्धान्तों
की सहमति देना, और अपने ही साथियों का उपकार I जबकि, हिन्दू का पूरा-का-पूरा धर्म आत्मज्ञान
पर केन्द्रित है I मनुष्य को दैव(divine) का आभास(realisation) होने पर वह दैव हो सकता है I मूर्तियां, मन्दिर, गिरजाघर
या (धर्म- सम्बन्धी) पुस्तकें केवल उसके आध्यात्मिक बाल्यकाल में सहायक होती हैं I
पर उसे तो आगे, और आगे बढ़ते ही जाना है I
उसे रुकना कहीं भी नहीं है I धर्मशास्त्र कहते
हैं,"बाहरी पूजा, भौतिक पूजा, सबसे निचली सीढ़ी है I ऊपर उठने के संघर्ष में अगली
सीढ़ी है - मानसिक प्रार्थना I पर सबसे ऊंची स्थिति तब आती है जब परमात्मा का ज्ञान
हो जाता है I" (महानिर्वाण तंत्र ४ : १२ ) I इस बात पर ध्यान दें कि वही सत्यान्वेषी
व्यक्ति, जो मूर्ति के आगे झुकता है, आपको बताता है, "वहां सूर्य का प्रकाश नहीं
होता, न ही चन्द्रमा अथवा तारों का प्रकाश होता है, न बिजली चमकती है, यह अग्नि वहां
कहाँ प्रकाश कर सकती है I "उसी" के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित होता है, उसके
प्रकाश से यह सब प्रकाशित होता है I"
[ न
तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोअयमग्निः I तमेव भान्तमनुभाति
सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति II (कठोपनिषद २ : २ : १५ ) ]
यदि मनुष्य अपने दैवीय(divine) स्वभाव को एक
मूर्ति के सहारे समझ सके, तो क्या इसे पाप कहना उचित होगा? और, जब वह इस अवस्था को
पार कर जाए, तब भी इसे दोषपूर्ण नहीं कहना चाहिए I
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हिन्दूके लिए, मनुष्य की यात्रा दोषपूर्ण से
सत्य की ओर नहीं है, वरन सत्य से सत्य की ओर है - निचले सत्य से ऊंचे सत्य की ओर I
उसके लिए सारे धर्मों - निम्नतम अन्धविश्वास(lowest fetishism) से लेकर उच्चतम पूर्णत्व(highest
absolutism) का अर्थ है - मनुष्य की आत्मा के अनेकों प्रयास - अनन्त(infinite) को समझने
तथा आत्मज्ञान प्राप्त करने के I और, प्रत्येक प्रयास के साथ आती हैं - उस आत्मा के
जन्म लेने और सम्बन्ध स्थापित करने(association) की शर्त I एक- एक प्रयास प्रगति का
एक-एक चरण इंगित करता जाता है I प्रत्येक आत्मा एक युवा गरुड़ (की तरह) है जो ऊंचा,
और ऊंचा उड़ता चला जाता है - तब तक, जब तक कि वह उस "गौरवपूर्ण सूर्य"(Glorious
Sun) तक नहीं पहुँच जाता I
प्रकृति का नियम है - अनेकता में एकता - और हिन्दू
ने इस बात को समझ लिया है I अन्य सभी धर्मों ने कुछ-न-कुछ धर्मान्धतापूर्ण आदेश जारी
किए हुए हैं, और समाज को उन्हें मानने पर बाध्य करता है I वे एक ऐसा सिला-सिलाया कोट
समाज के सम्मुख रख देते हैं जो 'अ', 'ब' या 'स' सब पर ही ठीक बैठे I यदि 'ब' और 'स'
पर सही नहीं बैठता, तो उन्हें उस कोट के बगैर ही रहना होगा - बिना शरीर को ढके I
हिन्दुओं ने इस बात का पता लगा लिया है कि सम्पूर्ण(absolute)
का ज्ञान केवल अर्जित ही किया जा सकता है, और मूर्तियां, क्रॉस, अर्धचन्द्र अनेक प्रतीक
मात्र हैं, अनेक ऐसी खूंटियां(pegs) हैं, जिनसे आध्यात्मिक विचारों को लटका कर रखा
जा सके I ऐसा भी नहीं है कि सभी को इनकी सहायता की आवश्यकता पड़े - पर जिनको आवश्यकता
नहीं है, उन्हें कोई अधिकार नहीं बनता कि वे इनको अनुचित ठहरा दें I और हिन्दू धर्म
में ये (प्रतीक ) अनिवार्य भी नहीं हैं I
एक बात मैं आपको अवश्य ही बताना चाहता हूँ I
भारत में मूर्तिपूजा को घृणित या भयंकर नहीं समझा जाता है I यह कोई वेश्याओं की जननी
जैसी थोड़े ही है I बल्कि, यह तो अविकसित मनों का उच्च आध्यात्मिक सत्यों को समझने का
एक प्रयास है I हिन्दुओं की अपनी त्रुटियाँ हैं, और कहीं-कहीं उनके अपवाद(exceptions)
भी हैं I - पर एक बात पर ध्यान दीजिये – वे अपने ही शरीर को कष्ट देंगे, अपने पड़ोसियों
का गला कभी नहीं काटेंगे I कोई धर्मान्ध हिन्दू अपने-आपको तो चिता में सकता है, पर
वह कभी भी दूसरों के लिए धार्मिक दंड की अग्नि प्रज्ज्वलित नहीं करेगा I और, इसे भी
उसके धर्म के प्रवेशद्वार पर इससे अधिक नहीं कहा जा सकता, जैसे ईसाई धर्म के प्रवेशद्वार
पर डायनों(witches) का जलाया जाना I
तो, हिन्दू के लिए धर्मों का यह सारा संसार केवल
एक यात्रा-भर है, जिसमें विभिन्न स्त्री-पुरुष, भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में, एक ही
ध्येय पर पहुँचते हैं I प्रत्येक धर्म, भौतिकतावादी मनुष्य के द्वारा एक
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ईश्वर की रचना करता है, और वही परमात्मा उन सबों
का प्रेरक बन जाता है I तब फिर इतने सारे विरोधाभास क्यों हैं? हिन्दू इस बारे में
कहता है, "ये सब भासमात्र(only apparent) हैं I ये विरोधाभास उसी “एक” सत्य से
निकलते हैं, जब वह अपने आपको विभिन्न परिस्थितियों और स्वभावों के अनुरूप ढाल लेता
है I
यह एक ही प्रकाश है, जो अनेक रंगों के काँचों
से निकलकर आ रहा है I ये छोटे-छोटे अंतर(variations) मनुष्य को अनुकूल बनाने की प्रक्रिया(adaptation)
के लिए आवश्यक हैं I परन्तु, सबकुछ
के केंद्र में उसी "एक" सत्य
का साम्राज्य है I ईश्वर ने कृष्ण के अवतार के रूप में हिन्दू से यह घोषणा की है,
"मैं सभी धर्मों में हूँ, वैसे ही जैसे एक धागे में अनेक मणियाँ पिरोई होती हैं
I“
[ मत्तः परतरं नान्यत किञ्चिदस्ति धनञ्जय I मयि
सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव II - गीता
७:७ ]
"जहां भी तुम्हें असाधारण शुद्धता और असाधारण
पवित्रता(holiness) उभरकर मानवता को पवित्र करती हुई दिखाई पड़े, समझ लेना मैं वहीं
पर हूँ I"
[यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा I
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोअंशसम्भवम् II - गीता १०:४१ ]
और इस का परिणाम क्या निकला है? मैं सारे विश्व
को चुनौती देता हूँ कि समस्त संस्कृत दर्शन पद्धति(System of Sanskrit Philosophy)
के अन्दर से किसी ऐसे कथन को ढूंढ निकालें कि केवल हिन्दू का ही उद्धार होगा, औरों
का नहीं I महर्षि व्यास कहते हैं, "हमारे अपने जाति और मतों के दायरे के बाहर
भी हमें सम्पूर्ण मनुष्य(perfect men) मिलते हैं I" (वेदान्तसूत्र ३:४:३६) I एक
बात और : तब फिर हिन्दू, जिसके सारे विचारों का ताना-बाना परमात्मा के इर्द-गिर्द है,
बौद्ध धर्म में कैसे विश्वास कर लेता है, जो अनीश्वरवादी(agnostic) है, या फिर जैन
धर्म में, जो नास्तिकतावादी(atheistic) है I
बौद्ध या जैन लोग परमात्मा पर निर्भर नहीं होते,
पर उनके धर्म का सारा बल, उस एक महान सार्वभौम सत्य की ओर निर्देशित है (जो प्रत्येक
धर्म में है) जिसके द्वारा मनुष्य परमात्मा बनने की ओर विकसित होता है I उन्होंने
"पिता" को तो नहीं देखा, पर "पुत्र" को अवश्य देखा है I और “जिसने
पुत्र को देख लिया, समझो उसने पिता को भी देख किया I”
तो बन्धुओं, यह हिन्दू लोगों के धार्मिक विचारों
का एक छोटा-सा खाका था I हिन्दू भले ही अपनी सारी योजनाओं को कार्यरूप में न ला पाया
हो, पर फिर भी यदि कोई सार्वभौम धर्म(universal religion) कभी अस्तित्व में आये, तो
वह ऐसा होगा जिसमे स्थान या काल का कोई अस्तित्व नहीं होगा I वह तो स्वयं
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उस परमात्मा की भाँति होगा, जो अनन्त(infinite)
है, जिसके बारे में यह बताएगा, और जिसकी कीर्ति का सूर्य कृष्ण और ईसा के अनुयाइयों
पर, संतों और पापियो पर, समान रूप से चमकेगा I न वह ब्राह्मण होगा, न बौद्ध, न ईसाई,
न मुसलमान - वरन इन सबका कुल योग होगा - फिर भी उसमे आगे विकास के लिए अनन्त सम्भावना
होगी I वह अपनी उदारता की अनन्त बाँहों में सबको समेत लेगा, और उसमें सभी मनुष्यों
के लिए स्थान होगा - निम्नतम, जमीन के स्तर वाले बर्बर, क्रूर मनुष्य से लेकर उन उच्चतम
व्यक्तियों तक, जो ह्रदय और मस्तिष्क के सर्वोच्च गुणों से विभूषित, मानवता से भी ऊपर
हैं, और जो समाज द्वारा इतनी श्रद्धा के पात्र हैं कि लोग उन्हें मानव न मान कर, उस
से भी ऊँचा (अतिमानव) मानते हैं I यह एक ऐसा धर्म होगा, जिसके संगठन(polity) में उत्पीड़न(persecution)
या असहष्णुता(intolerance) के लिए कोई स्थान न होगा, जिसमें यह माना जाएगा कि प्रत्येक
स्त्री-पुरुष के अन्दर दैवीयता(divinity) होती है I उसका सारा कार्यक्षेत्र, सारा बल,
इसी बात पर केन्द्रित होगा कि कैसे मानवता अपने वास्तविक, दैवीय स्वभाव को समझ सके
I
इस प्रकार के धर्म को सामने रखिए, फिर सारे देश
आपका अनुसरण करेंगे I अशोक की संसद, बौद्ध धर्म की संसद थी I अकबर की संसद, यद्यपि
अपने उद्देश्य में अधिक स्पष्ट थी, फिर भी वह विचारों के आदान-प्रदान की एक बैठक-मात्र
थी I विश्व के सारे भागों तक यह उद्घोष करना कि ईश्वर सारे धर्मों में है - यह कहना
तो अमरीका के लिए ही आरक्षित था I
जो हिन्दुओं का ब्रह्मन (ब्रह्म) है, पारसियों
का अहुरमज़्द है, बौद्धों का बुद्ध है, यहूदियों का यहोवा है, ईसाइयों का आकाश-स्थित
पिता है, वह आपको अपने नेक(noble) विचार को कार्यान्वित(carry out) करने की शक्ति दे
I पूर्व दिशा में सितारा उदित हुआ I वह धीर गति से पश्चिम की ओर बढ़ा I उसकी चमक कभी
कम हुई, कभी बढ़ गयी - और तब तक उसने विश्व का एक चक्कर पूरा कर लिया I और, अब वह फिर
से पूर्व के क्षितिज में उदय हो रहा है I सानपो नदी (तिब्बत में ब्रह्मपुत्र का नाम)
की सीमाएं पहले से हज़ार गुना अधिक चमक रही हैं I
लिबर्टी की जननी कोलंबिया की जय हो ! यह आपको
प्रदान की गयी है I इसके हाथ कभी अपने पड़ोसियों के रक्त से रंजित नहीं हुए I इसने धनाढ्य
होने के लिए पड़ोसियों को लूटने जैसा छोटा और आसान मार्ग कभी नहीं अपनाया I यह आपको
इसलिए दी गयी कि, आप सभ्यताओं के अग्रदूत बनकर, हाथ में मेल-मिलाप(harmony) का ध्वज
लेकर चल सकें I
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