Thursday, 2 April 2015

सनातन धर्म सोपान ४ - चारों वेदों का संक्षिप्त परिचय


ऋग्वेद

भक्तिभाव से निकले उद्गार जो छन्दोमय मन्त्रों(ऋचाओं) के रूप में हैं I ऋक (ऋचा) के ज्ञान को ही ऋग्वेद कहते हैं I इनमें प्रथम (आध्यात्मिक) वृत्ति की उपज तथा धार्मिक एवं लौकिक विचार दार्शनिक भावनाएं हैं I भारत की प्राचीनतम संस्कृति का विकास इसमें पाया जाता है I

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक  की गणना के अनुसार ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण एवं यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण की रचना ४,५००  वर्ष पूर्व हुई I इसे प्रमाणित करने के लिए उन्होंने यह ढूँढा कि उस काल के विषुव(equinoxes) किन दिनों, किस विशिष्ट नक्षत्र में घटित होते थे I उन्होंने पाया कि वे दिन और विशिष्ट नक्षत्र आज के दिनों से भिन्न थे I इसमें ,५०० वर्ष पहले परिवर्तन हुआ था, और आज भी वही स्थिति है I परिवर्तन का यह समय,  ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण एवं यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण की रचना का काल था I ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना इससे भी पहले हो चुकी थी I सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (३०० ई.पू.) तक अनेक राजवंश लगभग ६,५०० वर्षों तक भारतवर्ष में राज्य कर चुके थे, और इनसे बहुत पहले ही ऋग्वेद की रचना हो चुकी थी I तो,ऋग्वेद के मन्त्रों का निर्माण काल लगभग ८,००० वर्ष पूर्व माना जा सकता है I

ऋग्वेद के १० वें मण्डल में सूक्त ३९ / मन्त्र और सूक्त ४७ / मन्त्र में चार समुद्रों का उल्लेख है I बाद में इसी मण्डल के सूक्त १३६ / मन्त्र में दो समुद्रों (पूर्वी और पश्चिमी) का उल्लेख है I पहले वाले  सूक्तों के उत्तरी और दक्षिणी समुद्रों में से, उत्तरी समुद्र के अवशेष मिलते हैं – Black Sea, Caspian Sea, Aral Sea, Balqash Lake के रूप में I दक्षिणी समुद्र अरावली पर्वत श्रृंखला के दक्षिण में हुआ करता था, और उस के अवशेष राजस्थान की सांभर झील के रूप में हैं I इन समुद्रों का अस्तित्व ५० हज़ार से ७५ हज़ार वर्ष पूर्व था I इस से यह अनुमान निकाला गया है कि सम्भवतः ऋग्वेद इसी अति प्राचीन काल में संकलित किया गया हो I यह सम्भव हो सकता है कि ऋग्वेद का वर्तमान स्वरुप मानव जाति के सम्मुख ,००० वर्ष पूर्व ही परिरक्षित रूप में पाया  हो I 

ऋग्वेद-संहिता :

ऋग्वेद की मन्त्र संहिता का  दो प्रकार की प्रणालियों से वर्गीकरण किया गया है :

() अष्टक प्रणाली  : यह प्राचीन है -  अष्टक / ६४ अध्याय /  २००८ वर्ग / ऋचाएं (छन्दयुक्त मन्त्र) I

() मण्डल प्रणाली : यह अपेक्षाकृत आधुनिक है, और सुसंगठित प्रतीत होती है - १० मण्डल / ८५ अनुवाक / १०२८ (१०१७ + ११ बालखिल्य) सूक्त(एक आशय वाले मन्त्रों का संग्रह)  / १०,५८०ऋचाएं (छन्दयुक्त मन्त्र) I

प्रत्येक सूक्त के विशिष्ट देवता,ऋषि और छन्द हैं I

 

 

 


मण्डल यह दर्शाता है कि वह किस ऋषि-वंश / गोत्र से सम्बन्धित है I

मण्डल   
ऋषि / उनके कुल से सम्बन्ध
 
(बड़ा)                                        
बहुत से ऋषि (२३)
 
                                                       
गृत्समद
 
                                                        
विश्वामित्र
 
                                                         
वामदेव
 
                                                          
अत्रि
 
                                                          
भारद्धाज
 
(प्राचीनतम )                                         
वशिष्ठ
 
                                                           
कण्व   / अंगिरस
 
                                                         
बहुत से ऋषि
 
१०(बड़ा )                                          
बहुत से ऋषि (भाषा कुछ सरल , क्योंकि नयी है )
 

 

ऋचाओं को पढ़नेवाला होता कहलाता है, जो उच्च स्वर से अग्नि में आहुति देता है I ये प्रार्थनाएं हैं जो मुख्यतः लौकिक और देवताओं के विषयवस्तु हैं I 

लौकिक विषय  हैं  : द्यूतक्रीड़ा के दोष, मण्डूकों की ध्वनि, विवाह की विधि, दान की महिमा I

देवता, जिनकी प्रार्थना की गयी है : प्रमुख हैं अग्नि, इन्द्र I अन्य देवता हैं : सविता, रूद्र, मित्र, वरुण, सूर्य, मरुत, उषा, मन्यु (क्रोध) आदि I 

ऋग्वेद की २१ शाखाएं थीं (पतंजलि महाभाष्य तथा मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार) I अब केवल दो शाखाएं मिलती हैं -  शाकल तथा बाष्कलीय I शाखा  का तात्पर्य है : विशिष्ट ऋषियों  द्वारा स्थापित वेदपाठ की अलग-अलग परम्पराएं I

ऋग्वेद के कुछ महत्वपूर्ण सूक्त (एक आशय वाले मन्त्रों का समूह) १० वें मंडल में हैं I ये हैं  :

हिरण्यगर्भ सूक्त : संसार के आरम्भ में हिरण्यगर्भ(परमात्मा) (Golden Egg) ही था जो चराचर का स्वामी था, और उसी ने स्वर्ग, पृथ्वी सभी को धारण किया I उत्पन्न होने पर वह सारे प्राणियों का अद्वितीय अधीश्वर था I विशाल पर्वत और गम्भीर सागर उस हिरण्यगर्भ रूप परमात्मा (प्रजापति) के अनुशीलन में ही अवस्थित है I उसने इस पृथ्वी और आकाश को अपने-अपने स्थानों में स्थापित किया I उस प्रजापति की हम हवि द्वारा पूजा करें अथवा हम किस देवता की हवि द्वारा पूजा करें I 

पुरुषसूक्त : सृष्टि की प्रक्रिया का प्रतिपादन I जो कुछ हुआ है,और जो होनेवाला है, वह पुरुष (ईश्वर) ही है - वह प्राणियों के निमित्त अपनी कारणावस्था को छोड़ कर जगदावस्था को प्राप्त करता है I उसके तीन अविनाशी अंश

 


दिव्यलोक में हैं तथा उसका एक अंश ही यह ब्रह्माण्ड है I उस आदिपुरुष से जीव-पुरुष उत्पन्न हुए, जो देव, मनुष्य आदि रूप हुए, तथा अन्य जीव भी हुए I पुरुष से ऋक, यजु, साम उत्पन्न हुए I    

नासदीय सूक्त : सृष्टि की रहस्यमयता का संकेत : सृष्टि के पहले अन्धकार से घिरा हुआ अन्धकार ही उस समय वर्तमान था I उस प्रलय की अवस्था में असत, सत नहीं था, पृथ्वी, आकाश नहीं था , ब्रह्माण्ड भी कहाँ था I किसका कहाँ स्थान था ? क्या जल उस समय था ? उस समय मृत्यु, अमरता नहीं थी, रात-दिन का भेद भी नहीं था I वायु -शून्य, स्वावलम्बी श्वास-प्रश्वास युक्त केवल एक ब्रह्म था I उसके अतिरिक्त कुछ नहीं था I सर्वप्रथम परमात्मा में सृष्टि की इच्छा उत्पन्न हुई I उससे बीज की उत्पत्ति हुई I बीज-धारक पुरुष उत्पन्न हुआ I ऊपर पुरुष (भोक्ता ) और नीचे स्वधा(अन्न) अवस्थित हुआ I ये नाना सृष्टियाँ कहाँ से हुईं, किसने कीं, किसने नहीं कीं - यह सब वे ही जानें जो इनके स्वामी हैं I हो सकता है, वे भी यह सब नहीं जानते हों I

संवाद सूक्त (उर्वशी-पुरूरवा संवाद,यम-यमी संवाद) सामान्य जीवन को व्यक्त करते हैं I प्रेम, हास्य, करुणा,वीरता, जैसे मानवीय भाव I वैसे ही गो-सूक्त,भाषा-सूक्त, नदी सूक्त ,गर्भरक्षक सूक्त ,संज्ञान(एकता) सूक्त भी जीवन के विविध पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं I

ऋग्वेद में आर्यों तथा दासों के जीवन की जानकारी मिलती है I आर्य : दानी,उदार,धर्मनिष्ठ Iदास : कृपण,अनुदार,नास्तिक I 

ऋग्वेद के ब्राह्मण-ग्रन्थ :

ऐतरेय ब्राह्मण : विषय  हैं सोमयाग,अग्निहोत्र,राजसूय,राज्याभिषेक I इसमें सोम की आहुतियां, अग्निहोत्र गद्यरूप में दिए गए हैं I रचयिता  हैं ऐतरेय महीदास I

कौषीतकि (शांखायन) ब्राह्मण : विषय हैं सोमयाग, अग्निहोत्र, राजसूय, राज्याभिषेक I इसमें सोम की आहुतियां, राज्याभिषेक से सम्बंधित अनुष्ठान गद्यरूप में दिए गए हैं I रचयिता हैं कहोड़ कौषीतकि  I

ऋग्वेद के आरण्यक :

ऐतरेय आरण्यक - ऐतरेय ब्राह्मण ग्रन्थों से सम्बद्ध, और उन्हीं के अंग I 

कौषीतकि(शांखायन) आरण्यक : कौषीतकि ब्राह्मण ग्रन्थों से सम्बद्ध, और उन्हीं  के अंग I

ऋग्वेद के उपनिषद् :

ऐतरेयोपनिषद

कौषीतकि उपनिषद् + इससे सम्बद्ध छोटे उपनिषद् I    

 

यजुर्वेद

यज्ञकर्म रुपी प्रणाली, आहुति कर्म,  अनुष्ठान- विषयक I 

 यजुर्वेद - संहिता :

यज्ञों से सम्बन्धित मन्त्रों के ४० अध्याय / ,८८६ श्लोक ( इनमें से आधे ऋग्वेद से उद्धृत हैं ) I

यजुर्वेद की १०१ शाखाएं  हैं (पातंजलि महाभाष्य के अनुसार १००, मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार १०९ ) I

यज्ञ में यजुओं को पढ़नेवाला तथा कर्मविधि करानेवाला अर्ध्वयु(conductor of sacrifices) कहलाता है I

यजुर्वेद में दो सम्प्रदाय हैं : कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद I 

कृष्ण यजुर्वेद  में संहिता ब्राह्मण का सम्मिश्रण है I सम्मिश्रण के इस गुण के कारण इसका नाम "कृष्ण यजुर्वेद  " पड़ गया और इस प्रकार यह शुक्ल (शुभ्र या शुद्ध ) से पृथकत्व रखता है I  इस में मुख्यतः यज्ञों के विधान हैं I मन्त्रों के अतिरिक्त ब्राह्मण ग्रन्थ के विषय हैं तथा चर्चाएं हैं I

 कृष्ण यजुर्वेद की शाखाएं हैं, जिनके अंतर्गत संहिताएं (संग्रह ) हैं :

. तैत्तिरीय संहिता : यह सर्वाधिक  प्रसिद्ध शाखा है I इसमें काण्ड / ४४ प्रपाठक / ६३१ अनुवाक हैं I विषय  हैं - यज्ञीय कर्मकाण्ड , वाजपेय , राजसूय , पौरोडाश , याजमान आदि I

, , और मध्य   दक्षिण भारत में प्रचलित हैं I

. मैत्रायणी संहिता : इसमें दशपूर्णमास , चातुर्मास्य , राजसूय , सौत्रामणि आदि हैं  I

. कठ (काठक) संहिता : इसमें इसमें खण्ड / ४० स्थानक /  १३ अनुवाचन / ८४३ अनुवाक / ३०९१ मन्त्र हैं I दशपौर्णमास , अग्निहोत्र , आधान , अश्वमेध , पशुबन्ध आदि हैं I  

. कपिष्ठल संहिता :  यह अपूर्ण मिली है I  इसमें अष्टक / ४८ अध्याय हैं I  इसमें कठ के  ही समान विषय हैं I 

शुक्ल यजुर्वेद में शुद्ध रूप से केवल मन्त्र हैं I इसे वाजसनेय (याज्ञवल्क्य ) संहिता भी कहते हैं I संहिता से  ब्राह्मण ग्रन्थ पृथक  है I इसमें दशपौर्णमास ,अग्न्याधान , वसोर्धारा , सौत्रामणी , अश्वमेध, पितृमेध , महावीर सम्भरण आदि हैं I   इसकी दो शाखाएं हैं :

. माध्यन्दिनी संहिता : इसमें ४० अध्याय / १९७५ कण्डिका / ३९८८ मन्त्र हैं I

माध्यन्दिन संहिता के दो भाग हैं - पूर्वविंशति एवं उत्तरविंशति I 


पूर्वविंशति में से २० अध्याय (१२११ कण्डिका / २५८५ मन्त्र ) हैं I

उत्तरविंशति में २१ से ४० अध्याय (७६४ कण्डिका / १४०३ मन्त्र  ) हैं I

अध्याय १४ वेदिकाओं के लिए इष्टका( ईंट) स्थापन I

अध्याय १६ : रुद्राध्याय (रूद्र के विभिन्न रूपों को नमस्कार ) I

अध्याय  २२ अश्वमेध की विशेष आहुतियां I

अध्याय २४  अश्वमेध में देवताओं के लिए पशु-पक्षियों का स्थापन I

अध्याय  २५ अश्वमेध में वनस्पतियों की विशेष आहुतियां I

अध्याय  २८ प्रकृति का विराट यज्ञ I

अध्याय ३४ : शिवसंकल्प प्रार्थना I

अध्याय ३५ : पितरों की प्रार्थना I

अध्याय   ३७ यज्ञ में मृत्तिका , अग्नि आदि की स्थापना I

अध्याय  ३८ गौ , रस्सी आदि से सम्बन्धित I

अध्याय ४० : विशुद्ध  ज्ञानकाण्डपरक, दार्शनिक अध्याय है : ईश्वर संसार का नियामक है - यज्ञकर्म से शुद्ध हुए अंतःकरण को आत्मज्ञान से संस्कारित करने हेतु I ईशावस्योपनिषद् इसी से निकला है I पहले के ३९ अध्याय कर्मकाण्डपरक हैं I

पद्यात्मक मन्त्र : कर्मकाण्ड से सम्बंधित I

गद्यात्मक मन्त्र : राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत I

. काण्व संहिता : ४० अध्याय / ३२८३ अनुवाक / २०८६ मन्त्र I विषयवस्तु माध्यन्दिनी संहिता के ही समान है I

यजुर्वेद में अनुष्ठान विषयक संहिताओं के अतिरिक्त ऐसी प्रार्थनाएं भी हैं, जिनमें वेदिका, ईंटें, सहारा(stakes) के निर्माण का उल्लेख है I

यजुर्वेद के ब्राह्मण  :

पूर्ववर्ग :


कृष्ण यजुर्वेद : अलग से कोई ब्राह्मण नहीं है I  तैत्तिरीय ब्राह्मण (तैत्तिरीय संहिता का परिशिष्ट ) I इसमें काण्ड (अष्टक ) / अध्याय  हैं I  विषयवस्तु है अग्न्याधान यज्ञ, गवामयन यज्ञ, सौत्रामणि यज्ञ  आदि I  ये गद्य रूप में हैं I 

उत्तरवर्ग :

शुक्लयजुर्वेद : याज्ञवल्क्य ऋषि ने इसे सूर्योपासना से पाया , अतः पूरे ब्राह्मण ग्रन्थ में यह प्रामाणिक है I

माध्यन्दिनी शाखा : शतपथ ब्राह्मण I इसमें १४ काण्ड / १०० अध्याय हैं I 

काण्व शाखा  :  शतपथ ब्राह्मण I इसमें १७  काण्ड / १०४  अध्याय हैं I

इन दोनों की  ही विषयवस्तु में हैं  दशपूर्णमास , पितृयज्ञ (श्राद्ध ), उपनयन , स्वाध्याय, अश्वमेध ,सर्वमेध आदि I 

अग्निचयन अध्याय में शाण्डिल्य ऋषि को प्रामाणिक माना गया है I बृहदारण्यक उपनिषद् इसी ब्राह्मण का अन्तिम भाग है I

यजुर्वेद के आरण्यक 

बृहदारण्यक

तैत्तिरीय आरण्यक

मैत्रायणी आरण्यक

यजुर्वेद के उपनिषद्

(i) कृष्ण  यजुर्वेद :             कठोपनिषद (यम - नचिकेता संवाद में आत्मा का स्वरुप )

                    श्वेताश्वतर उपनिषद

                    मैत्रायणी (मैत्री) उपनिषद्

                    तैत्तिरीय उपनिषद्

(ii) शुक्ल यजुर्वेद :                  ईशोपनिषद (छोटा : केवल १७ मन्त्र  -यजुर्वेद का ४० वां अंतिम अध्याय )

                      बृहदारण्यक उपनिषद् (बड़ा : जनक -याज्ञवल्क्य शास्त्रार्थ से ब्रह्म का निरूपण - 

                                               याज्ञवल्क्य की विदुषी पत्नी मैत्रेयी  तथा उनसे शास्त्रार्थ करनेवाली गार्गी की कथा )

                                               + ३१ छोटे उपनिषद्


सामवेद

देवताओं का आवाहन, सोम की आहुति के लिए उद्गाता (सामों को गानेवाला) द्वारा स्वरसहित पाठ I साम का अर्थ है ऋचाओं का आलाप I अधिकतर  ऋचाएं ऋग्वेद से ली गयी हैं I

भारतीय संगीतशास्त्र की उत्पत्ति तथा विकास सामवेद से ही हुआ है I साम के स्वर मण्डल में आते  हैं : स्वर, ग्राम, ३१ मूर्छना, ४९ तान I सात स्वरों को २२ श्रुतियों में विभाजित किया गया है I ये श्रुतियां कान के द्वारा अनुभव  की जाने वाली विशिष्ट तरंगें हैं, जो मनुष्यों, प्राणियों  तथा वस्तुओं  पर विशेष प्रकार के प्रभाव डालती हैं I ये प्रभाव भौतिक और मानसिक, दोनों ही प्रकार से पड़ते हैं I सामवेद के मन्त्र इसी तथ्य पर आधारित हैं, जिनसे कष्टों का निवारण किया जाता था I

साम को ठीक स्वर में गाने वाले अब बहुत कठिनाई से मिलते हैं I यदि इनका उचित प्रकार से उपयोग किया जाए, तो दिव्य अनुभूति होती है I यह इस बात से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आज भी अच्छे संगीतकारों के गायन / वादन से श्रोताओं पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है I 

सामवेद की १००० शाखाएं हुआ करती थीं   अब केवल शाखाएं उबलब्ध हैं :

, कौथुमी  (सर्वाधिक लोकप्रिय )

. जैमिनीय 

. राणायनीय

4. ताण्ड्य

सामवेद  - संहिता :

सामवेद में  ४० पुस्तकें / ३२ अध्याय / गानरूप में ४६० प्रार्थनाएं(hymns) हैं I

७५ मन्त्रों को छोड़कर, शेष मन्त्र ऋग्वेद की ऋचाओं से लिए गए हैं I

सामवेद के दो मुख्य विभाग हैं - १ आर्चिक तथा २ गान I 

आर्चिक ऋग्वेद के मन्त्रों का समूह है, जिसके दो विभाग हैं - पूर्वार्चिक तथा उत्तरार्चिक I 

पूर्वार्चिक में ग्रामगेय गान (प्रकृति / वेयगान) तथा अरण्य गान है I यह ६ प्रपाठक (अध्याय) / ६५० मन्त्रों से निर्मित है, जिसके ४ पर्व (काण्ड) हैं - आग्नेय पर्व (अध्याय १), ऐन्द्र पर्व (अध्याय २-४), पावमान पर्व (अध्याय ५ ), तथा आरण्य पर्व (अध्याय ६) I पहले तीन ग्रामगान कहलाते हैं क्योंकि ये


ग्रामों में गाये जाते थे, तथा आरण्य पर्व केवल अरण्य (वन) में ही गाये जा सकते थे, ग्रामों में नहीं - क्योंकि इनमें संकटपूर्ण और वर्जित राग हैं I 

उत्तरार्चिक में ९ प्रपाठक (अध्याय) / १२२५ मन्त्र हैं, जिनमें दशरात्र, संवत्सर, तथा एकाह पर्व हैं I इस में ऊहगान तथा ऊह्यगान (रहस्य गान) हैं I ये यज्ञकार्य में साममन्त्रों को क्रमबद्धता प्रदान करते हैं I  

ग्रामगेय, अरण्य, ऊह तथा ऊह्यगान को संगीतबद्ध किया गया I परन्तु इनके लिखने का ढंग (notation) जब समझ के बाहर हो गया, तब इन्हें अर्चिका के रूप में सम्बद्ध किया गया I इस पर सायण ने भाष्य लिखा है I मन्त्रों के ऊपर लिखी संख्याएं उस मन्त्र - समूह के स्वरों को इंगित करती है I

सामवेद के  ब्राह्मण  :

  1. ताण्ड्य (पंचविश/प्रौढ़  ) ब्राह्मण : २५ पुस्तकें - प्राचीन दन्तकथाओं के साथ व्रात्यों (आर्यजाति से बहिष्कृत वर्ग ) के पुनः वर्णप्रवेश का वर्णन I
  2. षड्विंशति ब्राह्मण : पुस्तक - चमत्कार एवं शकुन से सम्बद्ध "अद्भुत  ब्राह्मण "   नामक एक अध्याय है I
  3. सामविधान ब्राह्मण
  4. आर्षेय छान्दोग्य ब्राह्मण
  5. देवताध्याय ब्राह्मण
  6. मन्त्र ब्राह्मण (संहितोपनिषद )
  7. जैमिनीय (तलवकार ) ब्राह्मण : भागों में - शतपथ ब्राह्मण (यजुर्वेद ) के सामान महत्वपूर्ण I  विज्ञान की भी सामग्री मिलती है I

सामवेद के सूत्र ग्रन्थ "प्रातिशाख्य" के नाम से जाने जाते हैंI 

सामवेद के  आरण्यक   :

तलवकार आरण्यक (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण)

सामवेद के  उपनिषद   :

छान्दोग्य उपनिषद्

केनोपनिषद  : यह बड़ा है

+ १४ छोटे उपनिषद्

 

 

अथर्ववेद

यज्ञ से भिन्न विषयों का आध्यात्मिक तथा अमंगल - बाधक संकलन I वैदिक परम्परा में यह "ब्रह्मवेद " कहलाता हैI  अथर्ववेद के रचयिता हैं  अथर्वा  तथा अंगिरा I  अथर्वा के शिष्य भृगु को अथर्ववेद के प्रचार - प्रसार का श्रेय जाता है I  

अथर्वा, वेदों के शान्तिपरक मन्त्रों के दृष्टा हैं तथा इन्होंने जनकल्याण हेतु इन्द्रजाल मन्त्रों की रचना की I अंगिरा ने हानिपरक मन्त्रों की रचना की I 

ब्रह्मा नामक ऋत्विक के उपयोग के लिए, जो होता, अर्ध्वायु , एवं उद्गाता की त्रुटियों का संशोधन करता था I यन्त्र - मन्त्रों द्वारा विघ्न - विनाश करनेवाला I

पतंजलि महाभाष्य के अनुसार अथर्ववेद की शाखाएं हैं (मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार ५० शाखाएं) I  

अब केवल शाखाएं उपलब्ध हैं : शौनक और पैप्पलाद I  

अथर्ववेद संहिता :  २० काण्ड / ७३१ सूक्त (एक सूक्त में एक ही विषय )  / ५८४९ मन्त्र (१२०० मन्त्र ऋग्वेद से )I  

प्रथम  काण्ड : मन्त्रों वाला  I

द्वितीय काण्ड : मन्त्रों वाले  I

तृतीय काण्ड : मन्त्रों वाले  I

चतुर्थ काण्ड : मन्त्रों वाले  I

पंचम काण्ड : न्यूनतम मन्त्रों वाले  I

षष्ठम काण्ड : मन्त्रों वाले (१४२ सूत्र ) I

सप्तम काण्ड : -  मन्त्रों वाले (११८ सूत्र ) I

१५ -१६ काण्ड : गद्य में I  ब्राह्मण ग्रंथों के समान  शैली

अथर्ववेद में हमें आर्य मध्यम वर्ग(Aryan middle class) तथा वणिक,कृषक, स्त्री के दैनिक जीवन का आभास मिलता है I तत्कालीन लौकिक विषय हैं :

- अभिचार (मारन, मोहन, उच्चाटन आदि ) सम्बद्ध क्रियाएँ

- शत्रुनाश

- आरोग्यप्राप्ति

१०

- गृहसुख

- कृषि में वृद्धि

- भूत -प्रेत निवारण

- कीट - पतंगों का नाश

- इष्ट वस्तु का लाभ 

- विवाह

- वाणिज्य

- पितृ पूजा

- विविध रोग स्वरुप तथा उनका निवारण (सर्पविष नाश प्रार्थना , शमीवृक्ष प्रार्थना , जीविका मन्त्र प्राप्ति )

- पहेलियाँ

- ब्रह्मचर्य की महत्ता

- सौमनस्य

अथर्ववेद में दार्शनिक सूक्त भी हैं (ब्रह्मन, तपस, असत विषयक विचार ) I  ये बाद में  उपनिषदों में विकसित हुए I 

  अथर्ववेद ब्राह्मण-ग्रन्थ :

पहले अथर्ववेद में कोई ब्राहमण नहीं था I बाद में विभिन्न ब्राहमण ग्रंथों से सामग्री लेकर गोपथ ब्राहमण का निर्माण हुआ I गोपथ ब्राहमण में पुस्तकें हैं - पूर्व गोपथ एवं उत्तर गोपथ I  इनमें सृष्टि , ब्रह्मा , ब्रह्मचर्य , गायत्री आदि की महिमा का वर्णन है I ओंकार के साथ त्रिमूर्ति का भी उल्लेख है I 

अथर्ववेद आरण्यक :

अथर्ववेद में आरण्यक नहीं मिलते हैं I 

अथर्ववेद उपनिषद् :

प्रश्नोपनिषद ,मुण्डकोपनिषद तथा माण्डूक्य उपनिषद् (यह छोटा है - केवल 12 वाक्य) I

1 comment:

  1. अथर्ववेद के रोग नाशक मंत्र मानव के कल्याणकारियों उपयोगी एवं सार्थक मंत्र है "

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