सनातन धर्म
"सनातन धर्म " का
अर्थ है - अनादिकाल
से चला आ रहा
धर्म , जिसे हम
"प्राचीन सिद्धांत " भी
कह सकते हैं
I यह
धर्म वेदों पर
आधारित है I वेद वे
पवित्र पुस्तकें हैं , जो
अनेक युगों पहले
मनुष्यों को दी
गयी थीं I इस धर्म
को "आर्य धर्म
" भी कहते हैं
, क्योंकि आर्यों के पहले
देश को यह
दिया गया था
I "आर्य " का अर्थ
है - कुलीन , ,भद्र,
( noble ), और यह
नाम उस महान जाति को
गया , जो विश्व
के इतिहास में
अपने से पहले
आ कर जा
चुकी जातियों से
चरित्र और रूप-रंग में
कहीं अधिक उन्नत
थी i इन लोगों
कर परिवार , आरम्भ
में उस स्थान
के उत्तरी भाग
में बसे , जिसे
भारत कहा जाता
है , और उस
स्थान को , जहां
पर ये बसे
,आर्यावर्त नाम दिया
गया - क्योंकि यहां
आर्य लोग रहने
लगे I आर्यावर्त
वह भूभाग था
, जो पूर्वी समुद्र
से पश्चिमी समुद्र
तक , और हिमवान
पर्वत तथा विंध्य
पर्वत के बीच
पड़ता था I
बाद के
दिनों में इस
धर्म को "हिन्दू
धर्म " नाम दिया
गया, और आज
भी यह इसी
नाम से जाना
जाता है I यह विश्व
के उन सभी
धर्मों में प्राचीनतम
है , जो अब
तक अपना अस्तित्व
बनाये हुए हैं
I इस
धर्म ने विश्व
को सर्वाधिक महान
व्यक्ति - महान शिक्षक
, महान लेखक , महान ज्ञानी
, महान सन्त , महान
राजा - महाराजा , महान योद्धा
, महान राजनीतिज्ञ , महान परोपकारी
और महान देशभक्त
दिए हैं I जितना ही अधिक
आप इस धर्म के बारे में ज्ञान
प्राप्त करते जाएंगे
, उतना ही इसके
प्रति आपका सम्मान
और स्नेह बढ़ता जायेगा , और आप उतना ही इस तथ्य के लिए आभारी होंगे कि आपने एक हिन्दू परिवार
में जन्म लिया I परन्तु ,जब तक
आप इस धर्म के योग्य नहीं हो पाते , तब तक यह भी आपका कुछ भला नहीं कर पायेगा I
यह एक
ऐसी बड़ी
नदी के समान
है , जिसमें कहीं
तो इतना पानी
है की एक
बच्चा भी उसमें
खेल सके
, और कहीं ऐसी
गहराइयाँ भी है
जिनमें बड़े - से - बड़ा
गोताखोर भी न
जा पाए I जितना ही इसे
पढ़ा जाता है
, उतना ही यह
ज्ञान को आलोकित
करता जाता है
और ह्रदय
को तृप्त करता
है I जो युवा
इसे थोड़ा -सा
भी समझ
पाता है , वह
अपने लिए आगामी जीवन
की समस्याओं से
अवश्य ही सांत्वना व
आनंद की वृद्धि
करा रहा है
I
"धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयति प्रजाः " (महाभारत
, कर्णपर्व ५९)
"वह जो
(संसार के ) लोगों
को धारण (support)
करता है , उन्हें
जोड़ कर रखता
है , वही धर्म
है I "
धर्म केवल
ऐसे विश्वासों (beliefs)
का मात्र एक
समूह नहीं है जिसका
मानवता व दैनिक
जीवन से कोई
सम्बन्ध ही
न हो , वरन
यह तो
स्वस्थ , परोपकारी जीवन के
सिद्धांत हैं I इन्हें माननेवाला
सच्चा आर्य (वैदिक धर्म
को माननेवाला ) है
, जो व्यक्तिगत आनन्द
तथा सर्वसाधारण
के निश्चित आनन्द
की राह पर कदम
रखता है I"वैदिक
धर्म " का अर्थ
है - वेदों से
सम्बंधित , अर्थात पूर्ण ज्ञान (perfect
knowledge) का धर्म I
२
सनातन धर्म का आधार
यह प्राचीन
धर्म एक सुदृढ़
नींव पर खड़ा
है , जिस पर
इसके ढाँचे की
दीवारें खड़ी की
गयी हैं I
इस नींव का
नाम है श्रुति
- "वह जो सुना
गया है I" इसमें चार वेद
आते हैं I दीवारों का नाम
है स्मृति
- " वह जो याद
कर लिया गया
है I " इसमें धर्मशास्त्र आते हैं
I
"श्रुति " को अत्यधिक
विद्वान लोगों
ने देवताओं से
सुना , और हमें
दिया I इन
पवित्र शिक्षाओं को पहले
- पहल कंठस्थ किया जाता था
, और बार - बार
दोहराया जाता था
I बाद को , आधुनिक
समय में इनको
लिख लिया गया
I
पहले शिक्षकगण शिष्यों
के सम्मुख इनका
उच्चारण करते थे
, और शिक्षक के
बाद शिष्य उनका
उच्चारण करते थे
- तब तक , जब
तक कि उन्हें
इनका भली भांति
ज्ञान न हो
जाए I आज
भी कहीं - कहीं
वैदिक पाठशालाओं में
इसी पद्धति का
अनुसरण किया जाता
है , और हम
वेदोच्चार के स्वर
सुन सकते हैं
I
श्रुति में चार
वेद होते हैं
(चतुर्वेद) I वेद का
अर्थ है "ज्ञान
" - जो कि
जाना गया है
- और यह ज्ञान
ही धर्म का
आधार
है
,जिसे चार वेदों
के रूप में
मनुष्य को दिया
गया है I इन
वेदों के नाम
हैं ऋग्वेद ,यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद
I
प्रत्येक वेद को
तीन भागों में
विभाजित किया गया
है :
१ . मन्त्र (संहिता) - संग्रह
२ . ब्राह्मण - इनके परिशिष्ट
में आरण्यक दिए गए
हैं
३ . उपनिषत्
मन्त्र
वाले भाग में
वे वाक्य हैं जिनकी
शब्द - संयोजना में एक
विशेष प्रकार की
शक्ति है
, और जिनके उच्चारण
से विशिष्ट ध्वनियां निकलती
हैं, जिससे कुछ
प्रभाव उत्पन्न होते हैं
I ये
देवताओं की स्तुतियों
के रूप में
हैं , और इनका
मनुष्यों के कल्याण
से सम्बन्ध है
I जब इनका उच्चारण
उचित ढंग से
, सुयोग्य और प्रशिक्षित
व्यक्तियों द्वारा किया जाता
है, तो कुछ
विशिष्ट परिणाम हमें सामने
आते दिखाई पड़ते
हैं I मन्त्रों का
उपयोग धार्मिक समारोहों
में होता है
, और इन का
सफल होना इस
बात पर निर्भर
करता है की
मन्त्रों का उच्चारण
उचित प्रकार से
हुआ , अथवा नहीं
I
३
ब्राह्मण
भाग में अनुष्ठानों
को करने से
सम्बंधित सम्बंधित निर्देश
हैं , और समारोहों
को संपन्न करने
की पद्धतियों
का वर्णन है
- वे समारोह जिनमें
प्रथम भाग में
उल्लिखित मन्त्रों का उपयोग
हुआ है I इसके
साथ ही सम्बन्धित
कथाओं का भी
उल्लेख है I ब्राह्मणों के
अंत में एकान्तवासी मनुष्यों
के पढ़ने योग्य
आरण्यक
दिए गए हैं
I ये अरण्य (वन
) में ही पढ़ने
योग्य हैं I
उपनिषत्
भाग में ब्राह्मण
की प्रकृति से
सम्बंधित गहन दार्शनिक
शिक्षाएं हैं I इनके विषय
हैं - परमात्मा और
पृथक की हुई
आत्मा , मनुष्य और ब्रह्माण्ड
, बंधन और मुक्ति
I यह संपूर्ण दर्शन
का आधार है
, और अत्यंत गूढ़
तथा कठिन है
I
वेदों का
एक चौथा भाग
भी प्राचीन काल में
हुआ करता था
, जिसे उपवेद या तंत्र कहा जाता
था I इसमें विज्ञान
और विज्ञान से
सम्बंधित व्यावहारिक निर्देश थे ,जिनका
वैज्ञानिक आधार था
I आज के
समय मैं प्राचीन
वास्तविक तंत्र बहुत
कम रह गया
है , क्योंकि ऋषिगण
यह जान चुके
थे कि आनेवाले
समय में लोग
अध्यात्म से मुंह
मोड़ने लगेंगे, और
तंत्र आज के
समय के अनुरूप
नहीं होंगे i इसलिए
वे उन्हें अपने
साथ लेते गए
I आज के समय
में पूजा में
कभी - कभी तांत्रिक
अनुष्ठान का प्रयोग
होता है I यह
या तो प्रचलित
वैदिक रीति
से , या फिर
उसके बिना ही
होता है I आज
जो पुस्तकें हमें
तंत्र के नाम
पर प्राप्य हैं
, उन्हें सामान्यतः वेदों का
अंग नहीं माना जाता
है I
श्रुति में जो
कुछ भी
है , उसकी
सर्वोच्च सत्ता है ,और
उसे सनातन धर्म
का प्रत्येक श्रद्धालु
अनुगामी , अंतिम रूप से
मानता है
I सारे सम्प्रदाय और दर्शन
- संस्थान , किसी भी
विवाद के छिड़ने
पर श्रुति को
सर्वोच्च मानते
हुए उसका अनुसरण
करते हैं I
स्मृति अथवा धर्मशास्त्र
,श्रुति पर आधारित
हैं ,और श्रुति
के बाद स्मृति
की ही सत्ता
आती है I स्मृति
में चार महान
कृतियाँ हैं I इन्हें
ऋषियों ने लिखा
है ,और ये
मुख्यतः नियम तथा
आचार - संहिताएं हैं जो व्यक्तिगत
, पारिवारिक , सामाजिक एवं राष्ट्रीय
जीवन को चलाने
का आधार हैं
I ये हैं
:
१ . मनुस्मृति अथवा मानवधर्मशास्त्र -
मनु की संस्थापनाएं
२ . याज्ञवल्क्यस्मृति
३ . शंखलिखित स्मृति
४ . पराशर स्मृति
४
उपरोक्त में से
पहली स्मृति (मनुस्मृति
) आर्य धर्म की
अग्रणी प्रणेता है , क्योंकि मनु
ही आर्य जाति
के नियमदाता हैं
I हिन्दू कालमान
के अनुसार विश्व
के इतिहास को सात
वृहद कालखंडों अथवा
कालचक्रों में बांटा
गया है I प्रत्येक
का आरम्भ एवं
अंत एक मनु
द्वारा किया जाता
है , और इसीलिये
उसे मन्वन्तर (मनु
- अंतर ) कहा जाता
है " (दो) मनुओं
के बीच " I
"जीवों को छह
अन्य मनुओं ने
,जो कि वृहद
बुद्धि और वृहद
भव्यता वाले थे
, और जो इस
मनु की जाति
के थे ,उत्पन्न
किया I इस
मनु के पूर्वज
स्वयंभू थे I"
प्रत्येक मन्वन्तर के
लिए दो मनु
होते हैं I यह
दर्शाता है कि
हम चौथे मन्वन्तर
में हैं , और
सातवें मनु के
शासन के अधीन
हैं I अगला श्लोक
यह बताता है
कि यह मनु
, विवस्वत के पुत्र
हैं I इनके कुछ
नियम मनुस्मृति में
आगे की पीढ़ियों
के लिए दिए
गए हैं I
नारदस्मृति में कहा
गया है कि
मनु ने एक
धर्मशात्र बनाया जिसमें १०८०
अध्याय ( १,०० ,००० श्लोक
) थे I इन्हें नारद
ने १२ ,०००
श्लोकों का कर
दिया I मार्कण्डेय ने इन्हें
८ ,००० श्लोक , और सुमति
(भृगु के पुत्र
) ने ४ ,०००
श्लोकों का कर
दिया I अब
ये नियम १२
अध्यायों और केवल
२ ,६८५ श्लोकों
में उपलब्ध हैं
I मनु
ने विश्व की उत्पत्ति
की व्याख्या की
, और भृगु से अपने
बताये सिद्धान्तों पर
व्याख्या करने को
कहा I भृगु
ने धर्मशास्त्र की
विवेचना करते हुए
निम्नलिखित व्याख्या की है
:
- छात्र (ब्रह्मचारी) के
कर्तव्य (अध्याय २ )
- गृहस्थ के कर्तव्य
(अध्याय ३ )
- स्नातक के कर्तव्य
(अध्याय ४ )
- खान
- पान , अशुद्धि- शुद्धि , स्त्री-
सम्बन्धी (अध्याय ५ )
- वानप्रस्थ
एवं सन्यास आश्रम
(अध्याय ६ )
- राजा के
कर्तव्य (अध्याय ७ )
- नागरिक तथा आपराधिक
न्याय प्रशासन ( civil and criminal law administration) (अध्याय ८ )
- स्त्री - पुरुष सम्बन्धी
सनातन नियम , आनुवंशिकता
सम्बन्धी नियम , कुछ अपराधों
के दंड , राज
- काज सम्बन्धी कुछ
अतिरिक्त आचार - विचार (अध्याय
९ )
५
- चार
जातियों के लिए
नियम - विशेषतः विपत्ति के समय
में (अध्याय १०
)
- प्रायश्चित्त सम्बन्धी नियम (अध्याय
११ )
- पुनर्जन्म ( अध्याय १२
) - यह अध्याय इस बात
की घोषणा
करता है कि
परम आनंद की
प्राप्ति तब होती
है , जब आत्मा
का ज्ञान हो
जाये - वह आत्मा
"जिस पर विश्व
आधारित है
I"
याज्ञवल्क्य स्मृति , मनुस्मृति
का ही सामान्यतः
अनुसरण करती है
, और मनुस्मृति के
बाद इसका ही सर्वाधिक
महत्व है I शेष दो
स्मृतियों का पठन
या सन्दर्भ अब
उतना नहीं लिया
जाता - केवल दक्षिण
भारत को छोड़
कर I इस
स्मृति में ३
अध्याय ( १०१० श्लोक
) हैं - आचार
( conduct ) , व्यवहार ( civil
law), प्रायश्चित्त (penance)
I
आचार में
जाति और वर्णाश्रम के कर्तव्य
, खान - पान
, उपहार , अर्पण , कुछ अनुष्ठान
, तथा राजा के
कर्तव्य हैं I व्यवहार
में सामाजिक नियम
पद्धति तथा अपराधों के दंड
I प्रायश्चित्त में शुद्धीकरण
पद्धतियाँ , संकट के
समय के कर्तव्य
, वानप्रस्थ तथा सन्यास
के नियम , तथा
शरीर - विज्ञान सम्बन्धी कुछ
ब्यौरा , परमात्मा तथा जीवात्मा
का वर्णन , मुक्ति
मार्ग , योग,
सिद्धियां , पुनर्जन्म तथा अनेक
प्रकार के प्रायश्चित्त I
जहां श्रुति
और स्मृति सनातन धर्म
की नींव और
दीवारें हैं , वहीं इन्हें
सहारा देनेवाले महत्त्वपूर्ण
अंग हैं पुराण
और इतिहास
I
पुराणों
में ऐतिहासिक कथाएँ एवं
दंतकथाएं (छिपे अर्थों
वाली कहानियां ) हैं
, जिन्हें अल्पशिक्षित लोगों के लिए
बनाया गया है
- विशेषतः उन लोगों
के लिए जो
वेदों को समझ
नहीं पाते व
उनका अध्ययन नहीं कर
सकते I ये कथाएं
अत्यंत रोचक हैं , और विभिन्न प्रकार की
सूचनाओं एवं ज्ञान से परिपूर्ण हैं I इनमें बहुत पुराने इतिहास का समावेश किया गया है , और उस समय की परिस्थितियां आज से बहुत भिन्न थीं I कुछ पुराणों
में संसार के अदृश्य लोकों का भी वर्णन है
इसलिए , पुराणों के समझने का दृष्टिकोण आधुनिक विज्ञान जैसा बना लेना अनुचित होगा I कुछ दंतकथाओं को समझने में कठिनाई हो सकती
है , और इसके लिए शिक्षक की आवश्यकता पड सकती है I
पुराणों की रचना महर्षि व्यास ने की है I मुख्य
पुराण १८ हैं I १८ उप - पुराण भी हैं I
मुख्य पुराण हैं : ब्रह्म , पद्म , विष्णु ,
शिव , भागवत , नारद , मार्कण्डेय , अग्नि , भविष्य , बर्ह्मवैवर्त , लिंग , वाराह
, स्कन्द , वामन (उप - पुराण भी ),कूर्म ,
मत्स्य, सुपर्ण (गरुड़ ) तथा ब्रह्माण्ड I
६
उप - पुराण हैं : सनत्कुमार , नृसिंह , वृहन्नारदीय
, शिवरहस्य , दुर्वासा , कपिल , वामन (पुराण भी ) , भार्गव , वरुण , कालिका , साम्ब
, नन्दी, सूर्य , पराशर, वशिष्ठ , देवीभागवत , गणेश, हंस I
देवीभागवत उनके लिए उपयुक्त है,जिनका संसार की
उत्पत्ति और विज्ञान की ओर अधिक् झुकाव है
I (वैष्णव) भागवत पुराण , भक्ति की ओर झुकाव
वालों के लिए है I
इतिहास के अन्तर्गत दो वृहत काव्यरचनाएं
आती हैं :
१ . रामायण
(रचनाकार महर्षि वाल्मीकि ), जिसमें सूर्यवंशी इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ के पुत्र
श्री रामचन्द्र , उनकी पत्नी सीता , उनके भाई , वनवास , सीताहरण , रावणवध , तथा रामराज्य
का इतिहास आता है I राजा रामचन्द्र भगवान विष्णु
के अवतार थे I यह एक अत्यंत रोचक तथा आनन्दित करनेवाली कथा है I
रामायण में त्रेता युग के अंत के तत्कालीन भारतीय
जनसाधारण के जीवन की विस्तृत झांकी प्रस्तुत की गयी है I इसमें रामचन्द्र जी तथा उनके भाइयों के जीवन के
द्वारा आदर्श भ्रातृत्व तथा परस्पर सौहार्द्र
दिखाया गया है , जिससे समृद्धि और सबका कल्याण सम्भव होता है I और यही आर्यों की जीवन-शैली , और आर्य - राजाओं के लिए एक आदर्श है I कहना न होगा , सीता का जीवन उपलब्ध साहित्य
में एक स्त्री की पवित्रता , पातिव्रत्य , तथा माधुर्य का आदर्श उदहारण है I
२ . महाभारत
(रचनाकार महर्षि व्यास ) , जिसमें
चंद्रवंशी कुरु वंश का इतिहास आता है I यह उत्तर भारत का एक राजसी परिवार था , जो आपसी
द्वेष तथा प्रतिस्पर्धा के चलते दो भागों में बंट गया - कौरव और पांडव I इन दोनों
दलों के बीच एक घमासान युद्ध हुआ , जो कि वास्तव में अच्छाई और बुराई का आपस में संघर्ष था I पांडवों के साथ अवतार श्रीकृष्ण थे I इस युद्ध
में न्याय की जीत हुई I महाभारत
, द्वापर युग के अंत के समय की कथा है I इसके बाद कलियुग का प्रारम्भ हो गया, जिसमें अच्छाई और बुराई दोनों बराबरी से स्पर्धा
करते हैं , और मनुष्य का मन नैतिक संघर्ष , अच्छा
- बुरा , "क्या करूँ, क्या न करूँ" को समझ पाने में अपने आप को असमर्थ पाता है I
महाभारत मे अनेकों सुन्दर कथाएं , नीति - सम्बन्धी
शिक्षाएं और विभिन्न उपयोगी पाठ मिलते हैं
I और , इसीमें आर्य- साहित्य का रत्न भगवद्गीता है I
७
ये दो ग्रन्थ - रामायण और महाभारत हमें प्राचीन भारत , उसके
लोग ,रहन - सहन , रीति - रिवाज , कला एवं उद्योग के बारे में बहुत
कुछ बताते हैं ई इनसे हमें यह पता चलता है कि
एक समय में भारत कितना महान था , और इसे पुनः महान बनाने के लिए हमें किस तरह
से व्यवहार करना चाहिए I
सनातन धर्म का विज्ञानं एवं दर्शन
:
जहां एक ओर श्रुति , स्मृति , पुराण एवं इतिहास
, हिन्दू धर्म रुपी भवन का निर्माण करते हैं , वहीं हम यह पाते हैं कि स्वयं धर्म ने ही विज्ञान एवं दर्शन सम्बन्धी एक
अत्यंत उत्कृष्ट साहित्य को जन्म दिया है I
विज्ञान को प्राचीन समय में छह अंगों में विभाजित
किया गया था I इन्हें षडंग ( षट -अंग
) कहते थे I आज के समय में हम इन्हें सांसारिक या धर्म - निरपेक्ष ज्ञान कह सकते हैं
, परन्तु पुराने समय में धार्मिक व सांसारिक ज्ञान अलग - अलग नहीं हुआ करते थे I
इन अंगों में शिक्षा ,कल्प , व्याकरण , निरुक्त
(शब्द - विकास विज्ञान ) , ज्योतिष , छन्द (काव्य ) तथा चौंसठ विज्ञान एवं कलाएं ,
तथा पठन - पाठन की विधि होती थी I जो व्यक्ति
षडंग में महारत हासिल कर लेता था , वह विशद
एवं गहन ज्ञान वाला व्यक्ति होता था I
दर्शन के भी छह विभाग थे , जिन्हें षड्दर्शन कहते थे I दर्शन का अर्थ है - वस्तुओं
को देखने का ढंग I इन्हें सामान्यतः छह संस्थान कहा जाता था I ये थे - न्याय , वैशेषिक , संख्या ,योग , मीमांसा
और वेदान्त I इन सभी का एक ही ध्येय था - मानवमात्र का परमात्मा से मिलन कराकर दुखों
का अंत करना I इसके लिए ये
सब एक ही विचार का प्रयोग करते थे - ज्ञान
का विकास I अलग - अलग मानसिक स्तरों के लिए अलग - अलग विधियां प्रयोग की जाती थीं
- वैसे ही, जैसे एक नगर को जाने के लिए अलग -अलग मार्ग I
दर्शन के इन छह विभागों में निम्नलिखित होता
था :
न्याय और वैशेषिक
समस्त संसार की वस्तुओं का वर्गीकरण करतेi हैं I साथ ही यह भी इंगित करते हैं कि मनुष्य को इन सबको इन्द्रियों द्वारा, निष्कर्ष एवं तुलना द्वारा , अथवा विद्धान एवं अनुभवी
८
व्यक्तियों द्वारा प्रमाणित होने पर जान सकता
है I न्याय और वैशेषिक इस बात की भी व्याख्या करते हैं कि कैसे परमात्मा ने अणुओं और परमाणुओं
से इस भौतिक जगत को बनाया I अन्त में
, वे इस बात को भी बताते हैं कि सर्वोच्च एवं
परम उपयोगी ज्ञान , परमात्मा का ज्ञान ही है , और क्यों है I साथ ही यह भी कि परमात्मा
,मनुष्य की गूढ़तम आत्मा भी है , और कैसे विविध प्रकार से परमात्मा का ज्ञान प्राप्त
हो सकता है I
सांख्य इस बात का गहनता से वर्णन करता है कि पुरुष
(spirit) और प्रकृति (matter) का वास्तविक
तथ्य क्या है , और इन का परस्पर सम्बन्ध क्या है I
योग का कहना है की पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (five
senses) और पांच कर्मेन्द्रियाँ (five organs of action) होती हैं , तथा इनके अतिरिक्त
अन्य सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ भी होती हैं I योग इन सूक्ष्म इन्द्रियों को विकसित करने की विधि उन
लोगों के हेतु बताता है , जो परमात्मा को जानना चाहते हैं , जो कि उनके अंदर की आत्मा
ही है I
मीमांसा
, कर्म (action) का वर्णन करती
है -जो कि दो प्रकार के होते हैं - धार्मिक
तथा सांसारिक I यह कर्म के परिणाम , कारण एवं प्रभाव (cause & effect) तथा इनके द्वारा किस प्रकार
मनुष्य का इस संसार या दूसरे संसार से बंधन होता है I
वेदान्त इस बात को पूर्णरूपेण बताता है कि परमात्मा
की वास्तविक एवं सत्य प्रकृति कैसी है I वह यह बताता है कि मनुष्य के अंदर का जीव (जीवात्मा ) वास्तव में यही
गूढ़तम परमात्मा है I मनुष्य किस प्रकार से जीवन - निर्वाह करे जिससे कि
कर्म उसे बाँध न सकें I परमात्मा की
वह मायाशक्ति क्या है जिससे यह सारा संसार उत्पन्न होता है और लोप हो जाता है , और कैसे मनुष्य योगाभ्यास के द्वारा परमात्मा
में लीन होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है I
आपने
उपरोक्त लेख को पूरा पढ़ा , यह आपकी सनातन धर्म (Hinduism) को निकट से जानने की इच्छा को दर्शाता है - साथ ही आपमें निहित श्रद्धा को
भी I
यह
लेख विभिन्न स्त्रोतों से उद्धरण लेकर संकलित किया गया है I यदि आपने इसमें कुछ उपयोगी
पाया है , और आगे भी पढ़ना चाहते हों ( सोपान
- II ) , तो कृपया इसी ई - मेल पर सूचित करें (arvindjoshi53@gmail.com) I
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ही सोपान – I पर अपनी टिप्पणी भी भेजें , जो कि
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