Monday, 19 January 2015

सनातन धर्म सोपान - १ : आधारशिला


सनातन धर्म

"सनातन धर्म " का अर्थ है - अनादिकाल से चला   रहा धर्म , जिसे हम "प्राचीन सिद्धांत " भी  कह सकते हैं I  यह धर्म वेदों पर आधारित है I वेद  वे पवित्र पुस्तकें हैं , जो अनेक युगों पहले मनुष्यों को दी गयी थीं I  इस धर्म को "आर्य धर्म " भी कहते हैं , क्योंकि आर्यों के पहले देश को यह दिया गया था I "आर्य " का अर्थ है - कुलीन , ,भद्र, ( noble ), और यह नाम उस महान  जाति  को गया , जो विश्व के इतिहास में अपने से पहले कर जा चुकी जातियों से चरित्र और रूप-रंग में कहीं अधिक उन्नत थी i इन लोगों कर परिवार , आरम्भ में उस स्थान के उत्तरी भाग में बसे , जिसे भारत कहा जाता है , और उस स्थान को , जहां पर ये बसे ,आर्यावर्त नाम दिया गया - क्योंकि यहां आर्य लोग रहने लगे I  आर्यावर्त वह भूभाग था , जो पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र तक , और हिमवान पर्वत तथा विंध्य पर्वत के बीच पड़ता था  I

बाद के दिनों में इस धर्म को "हिन्दू धर्म " नाम दिया गया, और आज भी यह इसी नाम से जाना जाता है I  यह विश्व के उन सभी धर्मों में प्राचीनतम है , जो अब तक अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं I  इस धर्म ने विश्व को सर्वाधिक महान व्यक्ति - महान शिक्षक , महान लेखक , महान ज्ञानी , महान सन्त  , महान राजा - महाराजा , महान योद्धा , महान राजनीतिज्ञ , महान परोपकारी और महान देशभक्त दिए हैं I  जितना ही अधिक आप इस धर्म  के  बारे  में  ज्ञान प्राप्त  करते  जाएंगे , उतना ही इसके प्रति आपका सम्मान और स्नेह बढ़ता जायेगा , और आप उतना ही  इस तथ्य के लिए आभारी होंगे कि आपने एक हिन्दू परिवार में जन्म लिया I परन्तु ,जब तक आप इस धर्म के योग्य नहीं हो पाते , तब तक यह भी आपका कुछ  भला नहीं कर पायेगा I

यह एक ऐसी  बड़ी नदी के समान है , जिसमें कहीं तो इतना पानी है की एक बच्चा भी उसमें खेल  सके , और कहीं ऐसी गहराइयाँ भी है जिनमें बड़े - से - बड़ा गोताखोर भी जा पाए I  जितना ही इसे पढ़ा जाता है , उतना ही यह ज्ञान को आलोकित करता जाता है और  ह्रदय को तृप्त करता है I जो युवा इसे थोड़ा -सा भी  समझ पाता है , वह अपने लिए आगामी  जीवन की समस्याओं से अवश्य ही सांत्वना  आनंद  की  वृद्धि करा रहा है I

"धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयति प्रजाः " (महाभारत , कर्णपर्व ५९)

"वह जो (संसार के ) लोगों को धारण (support) करता है , उन्हें जोड़ कर रखता है , वही धर्म है I  "

धर्म केवल ऐसे विश्वासों (beliefs) का मात्र एक समूह नहीं है  जिसका मानवता दैनिक जीवन से कोई सम्बन्ध ही  हो , वरन यह  तो स्वस्थ , परोपकारी जीवन के सिद्धांत हैं I इन्हें माननेवाला सच्चा आर्य (वैदिक  धर्म को माननेवाला ) है , जो व्यक्तिगत आनन्द तथा  सर्वसाधारण के निश्चित आनन्द की राह पर  कदम रखता है I"वैदिक धर्म " का अर्थ है - वेदों से सम्बंधित , अर्थात पूर्ण ज्ञान  (perfect knowledge) का धर्म I

 


सनातन धर्म का आधार

यह प्राचीन धर्म एक सुदृढ़ नींव पर खड़ा है , जिस पर इसके ढाँचे की दीवारें खड़ी की गयी हैं I इस नींव का नाम है श्रुति - "वह जो सुना गया है I"   इसमें चार वेद आते हैं  I दीवारों का नाम है स्मृति - " वह जो याद कर लिया गया है I " इसमें धर्मशास्त्र  आते हैं I

"श्रुति " को अत्यधिक विद्वान  लोगों ने देवताओं से सुना , और हमें दिया I इन  पवित्र शिक्षाओं को पहले - पहल कंठस्थ किया  जाता था , और बार - बार दोहराया जाता था I बाद को , आधुनिक समय में इनको लिख लिया गया I

पहले शिक्षकगण  शिष्यों के सम्मुख इनका उच्चारण करते थे , और शिक्षक के बाद शिष्य उनका उच्चारण करते थे - तब तक , जब तक कि उन्हें इनका भली भांति ज्ञान हो जाए I  आज भी कहीं - कहीं वैदिक पाठशालाओं में इसी पद्धति का अनुसरण किया जाता है , और हम वेदोच्चार के स्वर सुन सकते हैं I

श्रुति में चार वेद होते हैं (चतुर्वेद) I वेद का अर्थ है "ज्ञान " - जो कि  जाना गया है - और यह ज्ञान ही धर्म का आधार

 है ,जिसे चार वेदों के रूप में मनुष्य को दिया गया है I इन वेदों के नाम हैं ऋग्वेद ,यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद I

प्रत्येक वेद को तीन भागों में विभाजित किया गया है :

. मन्त्र (संहिता) - संग्रह

. ब्राह्मण - इनके परिशिष्ट में आरण्यक दिए गए हैं

. उपनिषत्  

मन्त्र वाले भाग  में  वे वाक्य हैं जिनकी शब्द - संयोजना में एक विशेष प्रकार की शक्ति  है , और जिनके उच्चारण से विशिष्ट ध्वनियां  निकलती हैं, जिससे कुछ प्रभाव उत्पन्न होते हैं I  ये देवताओं की स्तुतियों के रूप में हैं , और इनका मनुष्यों के कल्याण से सम्बन्ध है I जब इनका उच्चारण उचित ढंग से , सुयोग्य और प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, तो कुछ विशिष्ट परिणाम हमें सामने आते दिखाई पड़ते हैं I  मन्त्रों  का उपयोग धार्मिक समारोहों में होता है , और इन का सफल होना इस बात पर निर्भर करता है की मन्त्रों का उच्चारण उचित प्रकार से हुआ , अथवा नहीं I

 

  

ब्राह्मण भाग में अनुष्ठानों को करने से सम्बंधित  सम्बंधित  निर्देश हैं , और समारोहों को संपन्न करने की  पद्धतियों का वर्णन है - वे समारोह जिनमें प्रथम भाग में उल्लिखित मन्त्रों का उपयोग हुआ है I इसके साथ ही सम्बन्धित कथाओं का भी उल्लेख है I  ब्राह्मणों  के अंत में एकान्तवासी मनुष्यों के पढ़ने योग्य आरण्यक दिए गए हैं I ये अरण्य (वन ) में ही पढ़ने योग्य हैं I

उपनिषत् भाग में ब्राह्मण की प्रकृति से सम्बंधित गहन दार्शनिक शिक्षाएं हैं I इनके विषय हैं - परमात्मा और पृथक की हुई आत्मा , मनुष्य और ब्रह्माण्ड , बंधन और मुक्ति I यह संपूर्ण दर्शन का आधार है , और अत्यंत गूढ़ तथा कठिन है I

वेदों  का एक चौथा भाग भी प्राचीन  काल में हुआ करता था , जिसे उपवेद या तंत्र कहा जाता था I इसमें विज्ञान और विज्ञान से सम्बंधित व्यावहारिक निर्देश थे ,जिनका वैज्ञानिक आधार था I आज  के समय मैं प्राचीन वास्तविक तंत्र  बहुत कम रह गया है , क्योंकि ऋषिगण यह जान चुके थे कि आनेवाले समय में लोग अध्यात्म से मुंह मोड़ने लगेंगे, और तंत्र आज के समय के अनुरूप नहीं होंगे i इसलिए वे उन्हें अपने साथ लेते गए I आज के समय में पूजा में कभी - कभी तांत्रिक अनुष्ठान का प्रयोग होता है I यह या तो प्रचलित वैदिक  रीति से , या फिर उसके बिना ही होता है I आज जो पुस्तकें हमें तंत्र के नाम पर प्राप्य हैं , उन्हें सामान्यतः वेदों का अंग नहीं माना  जाता है I

श्रुति में जो कुछ  भी है  , उसकी सर्वोच्च सत्ता है ,और उसे सनातन धर्म का प्रत्येक श्रद्धालु अनुगामी , अंतिम रूप से मानता  है I सारे सम्प्रदाय और दर्शन - संस्थान , किसी भी विवाद के छिड़ने पर श्रुति को सर्वोच्च  मानते हुए उसका अनुसरण करते हैं I

स्मृति अथवा धर्मशास्त्र ,श्रुति पर आधारित हैं ,और श्रुति के बाद स्मृति की ही सत्ता आती है I स्मृति में चार महान कृतियाँ हैं I  इन्हें ऋषियों ने लिखा है ,और ये मुख्यतः नियम तथा आचार - संहिताएं हैं  जो व्यक्तिगत , पारिवारिक , सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन को चलाने का आधार हैं I ये  हैं :

. मनुस्मृति अथवा मानवधर्मशास्त्र - मनु की संस्थापनाएं

. याज्ञवल्क्यस्मृति

. शंखलिखित स्मृति

. पराशर स्मृति

 

  

उपरोक्त में से पहली स्मृति (मनुस्मृति ) आर्य धर्म की अग्रणी  प्रणेता  है  , क्योंकि  मनु ही आर्य जाति के नियमदाता हैं I  हिन्दू  कालमान के अनुसार विश्व के इतिहास  को सात वृहद कालखंडों अथवा कालचक्रों में बांटा गया है I प्रत्येक का आरम्भ एवं अंत एक मनु द्वारा किया जाता है , और इसीलिये उसे मन्वन्तर (मनु - अंतर ) कहा जाता है " (दो) मनुओं के बीच " I

"जीवों को छह अन्य मनुओं ने ,जो कि वृहद बुद्धि और वृहद भव्यता वाले थे , और जो इस मनु की जाति के थे ,उत्पन्न किया I  इस मनु के पूर्वज स्वयंभू थे I"

प्रत्येक मन्वन्तर के लिए दो मनु होते हैं I यह दर्शाता है कि हम  चौथे  मन्वन्तर में हैं , और सातवें मनु के शासन के अधीन हैं I अगला श्लोक यह बताता है कि यह मनु , विवस्वत के पुत्र हैं I इनके कुछ नियम मनुस्मृति में आगे की पीढ़ियों के लिए दिए गए हैं I

नारदस्मृति में कहा गया है कि मनु ने एक धर्मशात्र बनाया जिसमें १०८० अध्याय ( १,०० ,००० श्लोक ) थे I इन्हें  नारद ने १२ ,००० श्लोकों का कर दिया I मार्कण्डेय ने इन्हें ,०००  श्लोक , और सुमति (भृगु के पुत्र ) ने ,००० श्लोकों का कर दिया I  अब ये नियम १२ अध्यायों और केवल ,६८५ श्लोकों में उपलब्ध हैं I  मनु ने विश्व की उत्पत्ति की व्याख्या की , और भृगु से  अपने बताये सिद्धान्तों पर व्याख्या करने को कहा I  भृगु ने धर्मशास्त्र की विवेचना करते हुए निम्नलिखित व्याख्या की है :

- छात्र (ब्रह्मचारी) के कर्तव्य (अध्याय )

- गृहस्थ के कर्तव्य (अध्याय )

- स्नातक के कर्तव्य (अध्याय )

- खान  - पान , अशुद्धि- शुद्धि , स्त्री- सम्बन्धी (अध्याय )

-  वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रम (अध्याय )

- राजा के कर्तव्य (अध्याय )

- नागरिक तथा आपराधिक न्याय प्रशासन ( civil and criminal law administration) (अध्याय )

- स्त्री - पुरुष सम्बन्धी सनातन नियम , आनुवंशिकता सम्बन्धी नियम , कुछ अपराधों के दंड , राज - काज सम्बन्धी कुछ अतिरिक्त आचार - विचार (अध्याय )

    

-  चार जातियों के लिए नियम - विशेषतः विपत्ति के समय में (अध्याय १० )

- प्रायश्चित्त सम्बन्धी नियम (अध्याय ११ )

- पुनर्जन्म ( अध्याय १२ ) - यह अध्याय इस बात की  घोषणा करता है कि परम आनंद की प्राप्ति तब होती है , जब आत्मा का ज्ञान हो जाये - वह आत्मा "जिस पर विश्व आधारित  है I"

याज्ञवल्क्य स्मृति , मनुस्मृति का ही सामान्यतः अनुसरण करती है , और मनुस्मृति के बाद इसका  ही सर्वाधिक महत्व है I शेष  दो स्मृतियों का पठन या सन्दर्भ अब उतना नहीं लिया जाता - केवल दक्षिण भारत को छोड़ कर I  इस स्मृति  में  अध्याय ( १०१०  श्लोक ) हैं   - आचार ( conduct ) , व्यवहार ( civil law), प्रायश्चित्त (penance) I

आचार में जाति और  वर्णाश्रम के कर्तव्य , खान  - पान , उपहार , अर्पण , कुछ अनुष्ठान , तथा राजा के कर्तव्य हैं I  व्यवहार में सामाजिक नियम पद्धति तथा अपराधों के दंड I प्रायश्चित्त में शुद्धीकरण पद्धतियाँ , संकट के समय के कर्तव्य , वानप्रस्थ तथा सन्यास के नियम , तथा शरीर - विज्ञान सम्बन्धी कुछ ब्यौरा , परमात्मा तथा जीवात्मा का वर्णन , मुक्ति मार्ग  , योग, सिद्धियां , पुनर्जन्म तथा अनेक प्रकार के प्रायश्चित्त I

जहां श्रुति और स्मृति सनातन  धर्म की नींव और दीवारें हैं , वहीं इन्हें सहारा देनेवाले महत्त्वपूर्ण अंग हैं पुराण और इतिहास I

पुराणों में ऐतिहासिक कथाएँ  एवं दंतकथाएं (छिपे अर्थों वाली कहानियां ) हैं , जिन्हें अल्पशिक्षित लोगों के लिए बनाया गया है - विशेषतः उन लोगों के लिए जो वेदों को समझ नहीं पाते उनका अध्ययन   नहीं कर सकते I ये कथाएं अत्यंत रोचक हैं , और विभिन्न प्रकार की सूचनाओं एवं ज्ञान से परिपूर्ण हैं I इनमें बहुत पुराने  इतिहास का समावेश किया गया है , और उस समय  की परिस्थितियां आज से बहुत भिन्न थीं  I कुछ  पुराणों में संसार के अदृश्य लोकों का भी वर्णन है  इसलिए , पुराणों के समझने का दृष्टिकोण आधुनिक विज्ञान जैसा बना लेना अनुचित  होगा I कुछ दंतकथाओं को समझने में कठिनाई हो सकती है , और इसके लिए शिक्षक की आवश्यकता पड सकती है I

पुराणों की रचना महर्षि व्यास ने की है I मुख्य पुराण १८ हैं I १८ उप - पुराण भी हैं I

मुख्य पुराण हैं : ब्रह्म , पद्म , विष्णु , शिव , भागवत , नारद , मार्कण्डेय , अग्नि , भविष्य , बर्ह्मवैवर्त , लिंग , वाराह , स्कन्द , वामन (उप - पुराण  भी ),कूर्म , मत्स्य,  सुपर्ण (गरुड़ ) तथा ब्रह्माण्ड I

 

उप - पुराण हैं : सनत्कुमार , नृसिंह , वृहन्नारदीय , शिवरहस्य , दुर्वासा , कपिल , वामन (पुराण भी ) , भार्गव , वरुण , कालिका , साम्ब , नन्दी, सूर्य , पराशर, वशिष्ठ , देवीभागवत , गणेश, हंस I

देवीभागवत उनके लिए उपयुक्त है,जिनका संसार की उत्पत्ति और विज्ञान की ओर अधिक्  झुकाव है I (वैष्णव) भागवत पुराण  , भक्ति की ओर झुकाव वालों के लिए है I

इतिहास के अन्तर्गत दो वृहत  काव्यरचनाएं आती हैं :

१ . रामायण (रचनाकार महर्षि वाल्मीकि ), जिसमें सूर्यवंशी इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ के पुत्र श्री रामचन्द्र , उनकी पत्नी सीता , उनके भाई , वनवास , सीताहरण , रावणवध , तथा रामराज्य का इतिहास आता है I  राजा रामचन्द्र भगवान विष्णु के अवतार थे I यह एक अत्यंत रोचक तथा आनन्दित करनेवाली कथा है I

रामायण में त्रेता युग के अंत के तत्कालीन भारतीय जनसाधारण  के जीवन की विस्तृत झांकी  प्रस्तुत की गयी है I  इसमें रामचन्द्र जी तथा उनके भाइयों के जीवन के द्वारा आदर्श भ्रातृत्व तथा परस्पर  सौहार्द्र दिखाया गया है , जिससे समृद्धि और सबका कल्याण सम्भव होता है I और  यही आर्यों की जीवन-शैली , और आर्य - राजाओं  के लिए एक आदर्श  है I कहना न होगा , सीता का जीवन उपलब्ध साहित्य में एक स्त्री की पवित्रता , पातिव्रत्य , तथा माधुर्य का आदर्श उदहारण है I

२ . महाभारत (रचनाकार महर्षि व्यास ) , जिसमें चंद्रवंशी कुरु वंश का इतिहास आता है I यह उत्तर भारत का एक राजसी परिवार था , जो आपसी द्वेष  तथा प्रतिस्पर्धा के चलते  दो भागों में बंट गया - कौरव और पांडव I इन दोनों दलों के बीच एक घमासान  युद्ध हुआ , जो कि वास्तव  में अच्छाई और बुराई का आपस में संघर्ष  था I पांडवों के साथ अवतार श्रीकृष्ण थे I इस युद्ध में न्याय की जीत हुई I महाभारत , द्वापर युग के अंत के समय की कथा है I इसके बाद कलियुग  का प्रारम्भ हो गया, जिसमें अच्छाई और बुराई दोनों बराबरी से स्पर्धा करते हैं , और मनुष्य का मन नैतिक संघर्ष , अच्छा  - बुरा , "क्या करूँ, क्या न करूँ"  को समझ पाने में अपने आप को असमर्थ पाता है I

महाभारत मे अनेकों सुन्दर कथाएं , नीति - सम्बन्धी शिक्षाएं और विभिन्न उपयोगी  पाठ मिलते हैं I और  , इसीमें आर्य- साहित्य का रत्न भगवद्गीता है I 

 

 

     

ये दो ग्रन्थ - रामायण और महाभारत  हमें प्राचीन भारत  ,  उसके लोग ,रहन - सहन , रीति - रिवाज , कला एवं उद्योग के बारे   में  बहुत कुछ बताते हैं ई इनसे हमें यह पता चलता है कि  एक समय में भारत कितना महान था , और इसे पुनः महान बनाने के लिए हमें किस तरह से व्यवहार करना चाहिए I

 

सनातन धर्म का विज्ञानं एवं दर्शन :

जहां एक ओर श्रुति , स्मृति , पुराण एवं इतिहास , हिन्दू धर्म रुपी भवन का निर्माण करते हैं , वहीं हम यह पाते  हैं  कि  स्वयं धर्म ने ही विज्ञान एवं दर्शन सम्बन्धी एक अत्यंत उत्कृष्ट साहित्य को जन्म दिया है I

विज्ञान को प्राचीन समय में छह अंगों में विभाजित किया गया था I इन्हें षडंग ( षट -अंग ) कहते थे I आज के समय में हम इन्हें सांसारिक या धर्म - निरपेक्ष ज्ञान कह सकते हैं , परन्तु पुराने समय में धार्मिक व सांसारिक ज्ञान अलग - अलग नहीं हुआ करते थे I

इन अंगों में शिक्षा ,कल्प , व्याकरण , निरुक्त (शब्द - विकास विज्ञान ) , ज्योतिष , छन्द (काव्य ) तथा चौंसठ विज्ञान एवं कलाएं , तथा पठन - पाठन  की विधि होती थी I जो व्यक्ति षडंग में महारत हासिल कर लेता था , वह विशद  एवं गहन ज्ञान वाला व्यक्ति होता था I

दर्शन के भी छह विभाग थे , जिन्हें षड्दर्शन कहते थे I दर्शन का अर्थ है - वस्तुओं को देखने का ढंग I इन्हें सामान्यतः छह संस्थान कहा जाता था I  ये थे - न्याय , वैशेषिक , संख्या ,योग , मीमांसा और वेदान्त I इन सभी का  एक ही ध्येय था  - मानवमात्र का परमात्मा से मिलन  कराकर  दुखों का अंत करना I  इसके  लिए ये  सब एक ही विचार का प्रयोग करते थे - ज्ञान का विकास I अलग - अलग मानसिक स्तरों के लिए अलग - अलग विधियां प्रयोग की जाती थीं - वैसे ही, जैसे एक नगर को जाने के लिए अलग -अलग मार्ग I

दर्शन के इन छह विभागों में निम्नलिखित होता था :

न्याय और वैशेषिक समस्त संसार की वस्तुओं का वर्गीकरण करतेi हैं I साथ ही यह भी इंगित करते हैं कि  मनुष्य को इन सबको इन्द्रियों द्वारा, निष्कर्ष  एवं तुलना द्वारा , अथवा विद्धान एवं अनुभवी

 


व्यक्तियों द्वारा प्रमाणित होने पर जान सकता है I न्याय और वैशेषिक इस बात की भी व्याख्या करते हैं  कि कैसे परमात्मा ने अणुओं  और परमाणुओं  से इस भौतिक जगत  को बनाया I अन्त में , वे इस बात को भी  बताते हैं कि सर्वोच्च एवं परम उपयोगी ज्ञान , परमात्मा का ज्ञान ही है , और क्यों है I साथ ही यह भी कि परमात्मा ,मनुष्य की गूढ़तम आत्मा भी है , और कैसे विविध प्रकार से परमात्मा का ज्ञान प्राप्त हो सकता है I

सांख्य इस बात का गहनता से वर्णन करता है कि पुरुष (spirit) और प्रकृति  (matter) का वास्तविक तथ्य क्या है , और इन का परस्पर सम्बन्ध क्या है I

योग का कहना है की पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (five senses) और पांच कर्मेन्द्रियाँ (five organs of action) होती हैं , तथा इनके अतिरिक्त अन्य सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ भी होती हैं I योग  इन सूक्ष्म इन्द्रियों को विकसित करने की विधि उन लोगों के हेतु बताता है , जो परमात्मा को जानना चाहते हैं , जो कि उनके अंदर की आत्मा ही है I 

मीमांसा , कर्म (action) का वर्णन करती है -जो  कि दो प्रकार के होते हैं - धार्मिक तथा सांसारिक I यह कर्म के परिणाम , कारण एवं प्रभाव  (cause & effect) तथा इनके द्वारा किस प्रकार मनुष्य का इस संसार या दूसरे संसार से बंधन होता है I

वेदान्त इस बात को पूर्णरूपेण बताता है कि परमात्मा की वास्तविक एवं सत्य प्रकृति कैसी है I  वह  यह बताता है कि  मनुष्य के अंदर का जीव (जीवात्मा ) वास्तव में यही गूढ़तम परमात्मा है I मनुष्य  किस प्रकार से   जीवन - निर्वाह करे  जिससे कि  कर्म उसे  बाँध न सकें I परमात्मा की वह मायाशक्ति क्या है जिससे यह सारा संसार उत्पन्न होता है और लोप हो जाता  है , और कैसे मनुष्य योगाभ्यास के द्वारा परमात्मा में लीन होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है I 

आपने उपरोक्त लेख को पूरा पढ़ा , यह आपकी सनातन धर्म (Hinduism) को निकट से जानने की इच्छा   को दर्शाता है - साथ ही आपमें निहित श्रद्धा को भी I

यह लेख विभिन्न स्त्रोतों से उद्धरण लेकर संकलित किया गया है I यदि आपने इसमें कुछ उपयोगी पाया है , और आगे  भी पढ़ना चाहते हों ( सोपान - II ) , तो कृपया इसी ई - मेल पर सूचित करें (arvindjoshi53@gmail.com) I

साथ ही सोपान – I पर अपनी टिप्पणी भी भेजें , जो कि  आप से अपेक्षित है I

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